GS Paper-2 Social Justice (सामाजिक न्याय) Part-1 (Q.17)

GS PAPER-2 (सामाजिक न्याय) Q-17
 
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Q.17 - आज जब पूरे विश्व में मानवाधिकार एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है, ऐसे समय में भारत में महंगे होते इंसाफ और जेल में कैदियों की बढ़ती भीड़ क्या चिंता के विषय नहीं होने चाहिये? टिप्पणी कीजिये।
उत्तर :
भूमिका:
जेल के कैदियों और मानवाधिकार पर चर्चा -
       जेल के कैदियों को समाज से अलग-थलग कर उन्हें उनके कृत्यों की सजा दी जाती है। लेकिन एक सभ्य समाज की यह पहचान है कि वह अपराध करने वालों के मानवाधिकारों का हनन करे। इसके साथ ही जो दोष सिद्ध हुए बिना न्याय के इंतज़ार में कैदी जीवन व्यतीत करते हैं उनके लिये मानवाधिकार की रक्षा और अहम हो जाती है।
विषय-वस्तु
कैदियों की स्थिति पर चर्चा -
  हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा देश भर में जेल सुधारों, जेल संबंधी सभी पहलुओं को देखने और उन पर सुझाव देने के लिये तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया है। यह समिति जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों और जेलों में सज़ा भुगत रही महिलाओं की स्थिति पर रिपोर्ट देगी।
  31 दिसंबर, 2016 तक देश भर के 1,412 जेलों में 4.33 लाख कैदी थे, जबकि इन जेलों की क्षमता 3.81 लाख थी। जेलों की बदहाल स्थिति के कारण कई कैदियों की मृत्यु हो गई। जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने की सबसे बड़ी वज़ह ज़्यादा तादाद में न्यायालयों में मामलों का लंबित होना बताया जाता है। एक अध्ययन बताता है कि अंडर-ट्रायल (विचाराधीन) केसों के मामले में भारत दुनिया का 10वाँ बड़ा देश है।
  31 मार्च, 2016 के आँकड़ों के अनुसार, देश के विभिन्न न्यायालयों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं और इनकी संख्या में लगातार वृद्धि भी हो रही है। विचाराधीन मामलों की संख्या में वृद्धि होने की पहली प्रमुख वज़ह है भारत में जजों और फास्ट ट्रैक कोर्ट की कमी और दूसरी बड़ी वजह है, न्याय का महँगा होना। ज़्यादातर कैदी गरीबी की वज़ह से सही समय पर जमानत कराने में अक्षम होने के कारण दशकों तक जेल में जिंदगी व्यतीत करते हैं। इनमें से ज़्यादातर दलित, मुस्लिम और जनजातीय आबादी से होते हैं एवं आर्थिक रूप से कमज़ोर होते हैं। इसके साथ ही जेलों की दयनीय स्थिति की सबसे बड़ी वज़ह है, जेलों में कर्मचारियों की भारी कमी।
जेलों के सुधार की आवश्यकता एवं उसके लिये उपायों पर चर्चा -
  राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो द्वारा जारी Prison Statistics Report, 2015 में भारत के जेलों की दयनीय स्थिति बताई गई है। कैदियों की ज्यादा तादाद के कारण उनके लिये उचित भोजन, रहने लायक स्थान, सोने के लिये जगह और स्वच्छ माहौल आदि का नितांत अभाव है। कैदियों की मौतों के पीछे ये कारण अहम माने जा रहे हैं। अमूमन देखा जाता है कि अपराधी जेल से निकलकर दोबारा अपराध में संलिप्त हो जाते हैं। जेल की अमानवीय परिस्थितियाँ और कैदियों के साथ किया जाने वाला व्यवहार इसकी एक मुख्य वज़ह मानी जा रही है।
जेल सुधार हेतु उपाय
  सरकार को CrPC यानी कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीज़र की धारा 436 और 436A को प्रभावी रूप से लागू करने की कोशिश की जानी चाहिये।
  न्यायालयों में लंबित मुकदमों से निपटने के लिये जजों की मौजूदा रिक्त सीटों को भरने के साथ-साथ जजों की संख्या और बढ़ाई जाए। इससे ज़्यादा तादाद में फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन होगा और मामलों का निपटारा तुरंत हो सकेगा।
  जेलों की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट एवं विभिन्न समितियों की रिपोर्टस को सरकार को गंभीरता से लेना चाहिये।
  आज़ादी के बाद बनी कई समितियों, जैसे- 1983 की मुल्ला समिति, 1986 की कपूर समिति और 1987 की अबयर समिति के सुझावों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
  जेलों की बदइंतजामी को दूर करने के साथ-साथ कैदियों के सुधार के लिये प्रबुद्ध लोगों से युक्त एक बोर्ड बनाने की आवश्यकता है जो मॉडल जेल मैन्युअल को लागू कर कैदियों के सुधार में सहयोग दे सकें।
  साथ ही जेलों में कैदियों के कौशल विकास की व्यवस्था की जाए ताकि जेल से बाहर निकलने पर उन्हें आजीविका संबंधी समस्या का सामना करना पड़े।
निष्कर्ष:
       देखा जाए तो जेल सुधार का मसला एक मानवीय मसला है। एक सभ्य समाज में जेलों का मकसद अपराधियों को सुधार कर एक बेहतर इंसान बनाना होता है। एक जीवित व्यक्ति चाहे वह जेल में हो या जेल से बाहर, को पूरी तरह से सम्मान से जीने का अधिकार है। जेलें अगर अमानवीय यातना की जगह के रूप में तब्दील हो जाएँ तो इंसान सुधरने की बजाय अंतहीन पीड़ा से घिर जाएगा। जबकि जेल का उद्देश्य हर तरह की हिंसा, अवसाद और दूसरी नकारात्मकता से निजात दिलाना होना चाहिये। वास्तविक रूप में न्याय का शासन स्थापित करने के लिये जेल सुधार समय की मांग है।

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