Ancient History । Series-I P-3


प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Source of Ancient Indian History। Part-3



धर्मनिरपेक्ष साहित्य

  धर्मनिरपेक्ष साहित्य पाँच प्रकार का है
1.      ऐतिहासिक,
2.      अर्द्ध-ऐतिहासिक
3.      विदेशी विवरण
4.      जीवनियाँ तथा
5.      कल्पना-प्रधान एवं गल्पसाहित्य (विशुद्ध साहित्य)


1. ऐतिहासिक ग्रन्थ

  इसके अन्तर्गत राजाओं तथा उनके उत्तराधिकारियों का वर्णन, शासन-प्रबन्ध तथा अन्य राजनैतिक परिस्थितियों के अतिरिक्त आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ भी आती हैं। यहाँ ऐतिहासिक शब्द का जो वास्तविक अर्थ लिया गया है, उसका तात्पर्य राजाओं तथा उनके शासन-प्रबन्ध से है। इन पर प्रकाश डालने वाले ग्रन्थों को ही यह संज्ञा दी गयी है।

  राजतरंगिणी- कल्हण की राजतरंगिणी ही प्राचीन भारतीय साहित्य का एक ऐसा ग्रन्थ है, जिसे ठीक अर्थ में ऐतिहासिक कहा जा सकता है। इसकी रचना 1149-50 . में हुई थी। राग-द्वेष-विनिर्मुक्त होकर तथ्यों की विवेचना करना ही कल्हण का उद्देश्य था। राजतरंगिणी के लेखक का दृष्टिकोण पूर्णतया ऐतिहासिक था। उसने कश्मीर का पूर्ण इतिहास (आदिकाल से अपने काल तक का) लिखा है। विभिन्न ग्रन्थों के अध्ययन के पश्चात् ही कल्हण ने अपनी पुस्तक की रचना की। यद्यपि इस ग्रन्थ में कुछ काल्पनिक कथाओं का समावेश है, पर सातवीं शताब्दी . के पश्चात् का जो कश्मीरी इतिहास इस पुस्तक में वर्णित है, उस पर पूर्ण विश्वास किया जा सकता है।

  गुजराती इतिहासकार- कश्मीर की भाँति गुजरात में भी अपने वीरों के गुणगान तथा उनकी स्मृतियों को नवीन बनाने की प्रथा प्रचलित हुई। अनेकानेक कवियों तथा लेखकों ने इस ओर सफल प्रयास किया। सोमेश्वर का नाम इनमें विशेष रूप से लिया जा सकता हैं। इनकी दो पुस्तके रासमाला तथा कीर्ति-कौमुदी गुजराती इतिहास के कुछ पहलुओं पर काफी प्रकाश डालती हैं। अरि सिंह के सुकृति-संकीर्तन, राजशेखर के प्रबन्ध-कोष, जय सिंह के हम्मीर-मद-मर्दन तथा वस्तुपाल-तेजपाल-प्रशस्ति के अध्ययन से गुजरात का इतिहास आभासित हो जाता है। मेरुतुंग का प्रबन्ध-चिन्तामणि, उदयप्रभा की सुकृतिकीर्ति-कल्लोलिनी तथा बालचन्द्र का वसन्तविलास भी ऐसे ही ग्रन्थ हैं, जिनसे गुजरात का इतिहास मुखरित हो उठता है। इन सभी ग्रन्थों तथा ग्रंथकारों का उद्देश्य प्रशस्ति एवं गुणगान रहा है, किन्तु इनमें ऐतिहासिक तथ्यों का भी अभाव नहीं। चालुक्य-वंश के अधीन गुजरात की ऐतिहासिक गतिविधि का तो सजीव चित्रण हमे उपर्युक्त ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है।

  कौटिल्य का अर्थशास्त्र- इतिहास ग्रन्थों में कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस ग्रन्थ में मौर्यकालीन भारत की शासन-पद्धति, राजनैतिक व्यवस्था, सामाजिक आर्थिक जीवन का विशद् विवेचन है। इस प्रकार, . पू. चौथी शताब्दी के के इतिहास के लिए इस ग्रन्थ से अच्छी सहायता मिलती है।

  शुक्रनीतिसार- ऐतिहासिक दृष्टिकोण से इस ग्रन्थ की भी अपनी उपयेगिता है। इसके अध्ययन से तत्कालीन भारतीय समाज, उसके चिन्तन तथा उसकी प्रवृत्ति का पूर्ण बोध होता है। राजनीति-सम्बन्धी कुछ तथ्यों का ज्ञान (जो कि किसी विशेष राजा का नहीं है) हमें इसी प्रकार के नीतिग्रन्थों से होता है।

  कामन्दकीय नीतिसार- लगभग सातवीं-आठवीं शताब्दी . में कामन्दक ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनेकानेक सिद्धान्त अपनी पुस्तक नीतिसार में संग्रहीत किये तथा कुछ मौलिक पदों की रचना भी की। कामन्दकीय नीतिसार भी अर्थशास्त्र की भाँति प्रचलित हो गया और अनेकानेक संस्कृत टीकाकार तथा लेखकों ने इसे उद्धृत भी किया। यद्यपि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के समक्ष कामन्दकीय नीतिसार का उतना महत्त्व नहीं, किन्तु उस युग के राजस्व-सिद्धान्त, राजा के कर्तव्य तथा अन्य सामाजिक रीतियाँ (जिनका सम्बन्ध राज्य तथा राज्य के हितों से था) कामन्दकीय नीतिसार से अधिक स्पष्ट हो जाती हैं।

  बाहस्पत्य अर्थशास्त्र- अर्थशास्त्र की परिपाटी में कम से कम बीस ग्रन्थों की रचना हुई, किन्तु वे या तो काल के प्रवाह में समाप्त हो गये, या किसी विशालकाय ग्रन्थ की महानता में विलुप्त हो गये। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के पश्चात् केवल एक और अर्थशास्त्र प्राप्त होता है। जो बार्हस्पत्य अर्थशास्त्र के नाम से विख्यात है। विषय की उपयोगिता के दृष्टिकोण से ही इस ग्रन्थ को भी ऐतिहासिक ग्रन्थ की कोटि में रखा गया है। इसकी रचना-तिथि के विषय में कोई प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त नहीं है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि इसके कुछ अंशों की रचना नवीं तथा दसवीं शताब्दी . में हुई।


2. अर्द्ध-ऐतिहासिक

  इस वर्ग में जिन ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है; उनके विषय में केवल इतना कहना होगा कि उनके लेखकों का उद्देश्य यद्यपि ऐतिहासिक था, पर जिस मार्ग का अनुसरण करके ग्रन्थ-रचना हुई है, वह इतिहास के समानान्तर है। अत: इन ग्रन्थों में ऐतिहासिक घटनाओं का प्रतिबिम्ब आभासित होता है। इन अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थों में पाणिनि की अष्टाध्यायी, मार्गसंहिता, पतंजलि का महाभाष्य, कालिदास का मालविकाग्निमित्रम् तथा विशाखदत्त का मुद्राराक्षस विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।

  पाणिनि की अष्टध्यायी- यद्यपि यह एक व्याकरण का ग्रन्थ है, किन्तु इससे मौर्य-पूर्व तथा मौर्यकालीन राजनैतिक अवस्था पर प्रचुर प्रकाश पड़ता है। इस ग्रन्थ में कुछ व्याकरणों का उल्लेख किया गया है, जिससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इसके पूर्व भी संस्कृत के कुछ अन्य व्याकरण-ग्रन्थों की रचना हुई थी।

  मार्गसंहिता- यह पुराण का एक भाग है। इसमें यवन-आक्रमणों का उल्लेख किया गया है। इसी ग्रन्थ से (कुछ अन्य साक्ष्यों को लेकर) हम प्रथम शति के लगभग या इसके आसपास भारत पर यवनों का आक्रमण होना जानते हैं।

  पतंजलि का महाभाष्य- यद्यपि पाणिनि की अष्टाध्यायी के विवादाग्रस्त सिद्धान्तों तथा कुछ अबोधगम्य नियमों को सुलझाने के अभिप्राय से ही पतंजलि ने महाभाष्य की रचना की, किन्तु प्रसंगत: उदाहरणों तथा स्पष्टीकरण के रूप में जिन उपादानों का प्रयोग किया गया है, उनसे प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है।

  मालविकाग्निमित्रम्- यह सम्भवत: महाकवि कालिदास का प्रथम नाटक है। पूर्णतया साहित्यिक प्रवृत्ति का होते हुए भी इस ऐतिहासिक नाटक को अर्द्ध-ऐतिहासिक ग्रन्थों की कोटि में रखा जा सकता है। इस नाटक से शुंग-वंश तथा उसके पूर्ववर्ती राजवंशों की समकालीन राजनैतिक परिस्थिति का बोध होता है। राजकुलों के आन्तरिक जीवन का तो यह दर्पण है।

  मुद्राराक्षस विशाखदत्त-कृत यह नाटक यद्यपि कल्पना का आश्रय लेता हुआ अपनी साहित्यिकता की पूर्णता को प्राप्त करता है, पर चन्द्रगुप्त मौर्य, उसके मंत्री चाणक्य तथा कुछ तत्कालीन राजाओं का उल्लेख करके यह इतिहास को सुलझाने में बहुत कुछ योग देता है। संस्कृत साहित्य का सम्भवत: यह प्रथम जासूसी  नाटक (यद्यपि इसे ऐतिहासिक नाटक की संज्ञा दी गयी) है जो मौर्यकालीन भारत पर पर्याप्त प्रकाश डालता है।