Ancient History । Series-I P-2


प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Source of Ancient Indian History। Part-2



महाकाव्य

  वैदिक साहित्य के पश्चात् भारतीय साहित्य के दो स्तम्भ रामायण तथा महाभारत का अविर्भाव है। वास्तव में, सम्पूर्ण धार्मिक साहित्य में ये अपना ऊँचा स्थान रखते हैं। भारतीय इतिहास को अधिक से अधिक प्रकाश में लाने का श्रेय बहुत कुछ इन महाकाव्यों को ही दिया जा सकता है। रामायण के रचयिता महाकवि वाल्मीकि ने मर्यादा-पुरुषोत्तम राम का जीवन-चरित्र लिख कर तत्कालीन भारत की राजनैतिक, सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति को बोधगम्य बना दिया है।

  दूसरा महाकाव्य महाभारत है। मूल महाभारत के रचयिता व्यास मुनि माने जाते है। महाभारत के तीन संस्करण हुए जय, भारत तथा महाभारत। महाभारत का वर्तमान रूप प्राचीन इतिहास आख्यायिकाओं, कथाओं तथा उपदेशों का भण्डार माना जा सकता है। महाभारत प्राचीन भारत की सामाजिक तथा धार्मिक परिस्थिति पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। राजनैतिक परिस्थितियों का भी कुछ विवरण इसमें दिया गया है, किन्तु दुर्भाग्यवश तिथिक्रमानुसार इतिहास का इसमें सर्वथा अभाव है। कुछ कल्पित कथाओं के समावेश से भी ऐतिहासिक तथ्यों के अन्वेषण में कठिनाई उपस्थित हो जाती है।


पुराण


  महाकाव्यों के पश्चात् पुराणों का स्थान आता है। पुराणों की संख्या 18 है। पुराणों की रचना का श्रेय सूतलोमहर्षण अथवा उनके पुत्र (सौति) उग्रश्रवस या उग्रश्रवा को दिया गया है। पुराणों के अन्तर्गत पाँच विषयों का वर्णन साधारणतया हुआ है-
    1.  सर्ग (आदि सृष्टि),
    2.  प्रतिसर्ग (प्रलय के पश्चात् पुनसृष्टि),
    3.  वंश (देवताओं तथा ऋषियों की वंश तालिका),
    4.  मन्वन्तर (कल्पों के महायुग, जिनमें मानव का स्रष्टा मनु माना गया है) तथा
    5.  वंशानुचरित (प्राचीन राज-कुलों का इतिवृत्त)

  पुराणों के उक्त पाँच विषय होते हुए भी अठारह पुराणों में वंशानुचरित का प्रकरण नहीं प्राप्त होता। यह दुर्भाग्य ही है, क्योंकि पुराणों में जो ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अधिक महत्त्वपूर्ण विषय है, वह वंशानुचरित है। वंशानुचरित केवल भविष्य, मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्रह्माण्ड तथा भागवत पुराणों में ही प्राप्त होता है। गरुड पुराण में भी पौरव, इक्ष्वाकु और बाहद्रथ राजवंशों की तालिका प्राप्त होती है, किन्तु इनकी तिथि पूर्णतया अनिश्चित है।

  पुराण इतिहास की प्रचुर सामग्री उपस्थित करते हैं। वे प्राचीन काल से लेकर गुप्त-काल तक के इतिहास से सम्बन्धित अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं का परिचय करा देते हैं जिनकी प्रामाणिकता के लिए हमें अन्य साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है। इतिहासकारों को पुराणों से सर्वथा यह असन्तोष रहा है कि ये तिथिपरक नहीं हैं और साथ ही काल्पनिक घटनाओं, कथाओं एवं गल्पों का समावेश तो इन पुराणों में काफी किया गया है।


स्मृतियाँ

  ब्राह्मण ग्रन्थों में ऐतिहासिक उपयोगिता के दृष्टिकोण से स्मृतियों का भी विशेष महत्त्व है। मनु, विष्णु, याज्ञवल्क्य, नारद, वृहस्पति, पराशर आदि की स्मतियाँ विशेष उल्लेखनीय है। ये धर्मशास्त्र के नाम से विख्यात है। सभी स्मृतियों में साधारणत: वर्णाश्रम धर्म, राजा के कर्त्तव्य तथा श्राद्ध एवं प्रायश्चित्त इत्यादि के विषयों में प्रकाश डाला गया है। इस प्रकार, केवल सामाजिक तथा धार्मिक विषयों पर जितना इन स्मृतियों में लिखा हुआ है, उतना सम्भवत: अन्य किसी ग्रन्थ में नहीं।


अब्राह्मण ग्रन्थ

  गौतम बुद्ध के अनुयायियों ने जिस साहित्य का सृजन किया, उसका उद्देश्य पूर्णतया धार्मिक होते हुए भी ऐतिहासिक है। भारतीय इतिहास की सामग्री उसमें बहुत कुछ निहित है। बौद्ध ग्रन्थों में त्रिपिटक अधिक महत्त्वपूर्ण है। सुत्त, विनय तथा अभिधम्म तीनों मिलकर त्रिपिटक कहलाते हैं। सुत्त में दीर्घ, मज्झिम, संयुक्त, अंगुत्तर तथा खुद्दक पाँच निकाय हैं। इन सभी निकायों में बौद्ध सिद्धान्त तथा कहानियाँ हैं। सिद्धान्तों का ऐतिहासिक महत्त्व बहुत है, क्योंकि बौद्ध-दर्शन के अध्ययन में ये काफी योग देते हैं। कहानियाँ भी तत्कालीन सामाजिक अवस्था का प्रसंगत: वर्णन करती हैं। पातिमोक्ख, महाबग्ग, चुल्लवग्ग, सुत्तविभंग तथा परिवर में भिक्षु-भिक्षुनियों के नियमों का वर्णन किया गया है। उपर्युक्त पाँचों ग्रन्थ विनय के अन्तर्गत है। अभिधम्म के सात संग्रह है। इनमें तत्त्वज्ञान की चर्चा की गयी है। बौद्ध धर्म तथा तत्कालीन सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों के अध्ययन में इन ग्रन्थों का महत्त्व काफी है।

  त्रिपिटकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये बौद्ध-संघों के संगठन का पूर्ण विवरण उपस्थित करते हैं। साथ ही, तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों का भी बोध कराते हैं।

  जातक- बौद्ध ग्रन्थों में जातक का दूसरा स्थान है। इनकी संख्या लगभग 549 है। जातकों में भगवान् बुद्ध के पूर्वजन्म की कथायें संग्रहीत हैं। यद्यपि इनका दृष्टिकोण पूर्णतया धार्मिक है; किन्तु इनके अध्ययन से तत्कालीन सामाजिक तथा आर्थिक अवस्था पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। सांस्कृतिक तथा धार्मिक क्षेत्र पर तो ये पर्याप्त प्रकाश डालते हैं। कुछ जातकों से बुद्धपूर्व तथा बुद्धकालीन भारत की राजनैतिक परिस्थितियों का भी आभास मिलता है।

  दीपवंस, महावंस- त्रिपिटक तथा जातकों के पश्चात् दीपवंस तथा महावंस नामक दो पालि महाकाव्यों का स्थान है। मौर्य-साम्राज्य के इतिहास का अध्ययन करने में ये दोनों ग्रन्थ अधिक सहायक सिद्ध होते हैं, किन्तु इनकी सूचनाओं को स्वीकार करते समय तर्क एवं विवेक से काम लेना आवश्यक है।

  मिलिन्दपन्हो- यह अन्य पालि ग्रन्थ है। इस पुस्तक में यूनानी नरेश मिलिन्द या मिनैन्डर और बौद्ध भिक्षु नागसेन का वार्तालाप है। इस ग्रंथ से तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक अवस्थाओं के अतिरिक्त आर्थिक अवस्था का भी पूर्ण विवरण प्राप्त होता है। भारत के विदेशी व्यापार का तो इसमें सजीव चित्रण किया गया है। तत्कालीन राजनैतिक अवस्था का भी प्रासंगिक विवरण इस पुस्तक में प्राप्त होता है।

उपर्युक्त बौद्ध-ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे गये हैं। इनके अलावा संस्कृत ग्रन्थों का विवरण है-

  दिव्यावदान- संस्कृत गद्य की यह पुस्तक अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती है। अशोक तथा उसके उत्तराधिकारियों के विषय में इससे बहुत अधिक जानकारी प्राप्त होती है।

  मंजूश्री मूलकल्प- यह भी संस्कृत का ग्रन्थ है। इसमें मौर्यों के पूर्व तथा हर्ष तक की राजनैतिक घटनाओं का बीच-बीच में उल्लेख मात्र कर दिया गया है। यह ग्रन्थ भी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से काफी महत्त्व रखता है।

  ललित विस्तार- इससे महात्मा बुद्ध के जीवन पर प्रकाश पड़ता है और प्रसंगत: तत्कालीन धार्मिक अवस्था तथा सामाजिक रीतियों का भी वर्णन प्राप्त हो जाता है।

  जैन ग्रन्थ- बौद्ध ग्रन्थों की भाँति जैन ग्रन्थ भी पूर्णतया धार्मिक हैं। इन ग्रन्थों में परिशिष्टपर्वन् विशेष महत्त्वपूर्ण है। भद्रबाहुचरित्र दूसरा महत्त्वपूर्ण जैन ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ से जैनाचार्य भद्रबाहु के साथ-साथ चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन पर भी कुछ प्रकाश पड़ता है। उपर्युक्त दो प्रमुख ग्रन्थों के अतिरिक्त कथाकोष, पुण्याश्रव-कथाकोष, लोक-विभाग, त्रिलोक-प्रज्ञप्ति, आवश्यक सूत्र, भगवती सूत्र, कालिकापुराण आदि अनेक जैन ग्रन्थ भारतीय इतिहास की सामग्री उपस्थित करते हैं। जैन-साहित्य में कुछ ऐसे भी ग्रन्थ हैं, जिनका प्रकाशन या जिनका अन्य भाषाओं में अनुवाद नहीं हो सका है, जिससे बहुत-सी ऐतिहासिक सामग्रियाँ नहीं प्राप्त की जा सकी हैं; किन्तु, कल्पसूत्रों से जो कुछ सामग्री प्राप्त हो सकी है, उसकी उपयोगिता निर्विवाद है।