Ancient History । Series-I P-4


प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Source of Ancient Indian History। Part-4



3. विदेशी विवरण

  भारतीय सामग्री के अतिरिक्त हमारे इतिहास की कुछ अभारतीय सामग्री भी प्राप्त होती है, जिससे इतिहास-सम्बन्धी अनेकानेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का बोध होता हैं। ये सामग्री उत्साही यात्रियों, धर्मनिष्ठ तथा भ्रमणशील विद्यार्थियों एवं विदेशी इतिहासकारों की रचनाओं से प्राप्त होती हैं और इसीलिये इन्हें विदेशी विवरण की संज्ञा दी जाती है। विदेशी विवरण का महत्त्व भारतीय इतिहास का तिथिक्रमानुसार अध्ययन करने में सर्वमान्य हैं। वास्तव में भारतीय सामग्रियों की कमी की पूर्ति करने वाले ये विदेशी विवरण ही हैं। जहाँ हिन्दू, जैन तथा बौद्ध ग्रन्थ मौन हो जाते हैं, वहाँ ये विदेशी विवरण ही इतिहासकार को कुछ प्रकाश दे पाते हैं।

  विदेशी विवरणों के सम्बन्ध में एक बात प्रारम्भ में उल्लेखनीय है कि इनकी कुछ अपनी सीमाएँ हैं। यूनानी, रोमन, चीनी, तिब्बती आदि भारतीय परम्परा से प्राय: अपरिचित थे। उनमें से बहुतों को हमारी भाषा का ज्ञान था। ऐसी स्थिति में इनकी रचनाओं या विवरणों में कुछ भ्रान्ति के दर्शन स्वभावत: होते हैं। टेरियस विचित्र रीति-रिवाजों की तालिका दे सकता है, फाह्यान तथा ह्वेनसांग को हर मंदिर बौद्ध-विहार दिखाई पड़ सकता था। पर, इन सीमाओं के होते हुए भी, हम विदेशियों के विवरणों के महत्त्व को कम नहीं कर सकते हैं। हम भारतीय इतिहास के साधनों का उल्लेख करते समय विदेशी विवरणों को इसीलिए और अधिक महत्त्व देते हैं कि उनमें से कुछ तो राजदूत के रूप में भी आये हैं जो प्राय: उत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य हैं। स्वतंत्र पर्यटकों की लगन एवं उनका उत्साह भी सराहनीय रहा है।

  यूनानी- यूनानी विवरणों को सुविधानुसार तीन वर्गों में विभाजित कर दिया गया है-

1. सिकन्दर-पूर्व,

2. सिकन्दर-कालीन तथा

3. सिकन्दर के बाद

  सिकन्दर के पूर्व के लेखक- सिकन्दर के पूर्व के यूनानी लेखकों में स्काई लैक्स, हिकेटिअस मिलेटस, हेरोडोटस तथा केसिअस के नाम उल्लेखनीय है। स्काई लैक्स एक यूनानी सैनिक था जो फारस के सम्राट् दारा के आदेशानुसार सिन्धु नदी का पता लगाने भारत आया था। उसने अपनी यात्रा का विवरण तैयार किया, किन्तु उसकी जानकारी विशेष कर सिन्धु-घाटी तक ही सीमित थी। इस परम्परा का दूसरा लेखक हिकेटिअस मिलेटस (.पू. 549-496 .पू.) था। इसका ज्ञान भी सिन्धु घाटी तक सीमित था। इस परम्परा के लेखकों में मूर्धन्य स्थान हेरोडोटस (.पू. 484-431 .पू.) का है। उसे इतिहास का जनक कहा जाता है। भारत की जानकारी हमें उसकी प्रसिद्ध रचना हिस्टोरिका में मिलती है। केसिअस यूनानी राजवैद्य था। इसने भी भारत के विषय में लिखा है किन्तु प्रामाणिकता की दृष्टि से उसकी अधिकांश सामग्री सन्देहास्पद है। सिकन्दर के पूर्व के उपर्युक्त लेखकों के विवरण अक्षरश: सत्य और विश्वसनीय नहीं हैं, किन्तु इन विवरणों को अन्य शास्त्रों द्वारा प्रामाणिक बना कर कुछ लाभ उठाया जा सकता है।

  सिकन्दर-कालीन- भारतीय इतिहास की सामग्रियों के अन्वेषण के क्षणों में सिकन्दर की स्मृति जाती है। सिकन्दर के साथ कुछ ऐसे भी उत्साही व्यक्ति आये थे जिन्होंने अपने भ्रमण का वृत्तान्त लिपिबद्ध किया। इन लेखकों में अरिस्टोबुलस, निआर्कस, चारस, युमेनीस आदि प्रसिद्ध हैं। इन लेखकों ने सिकन्दर के आक्रमण का सजीव चित्रण किया है। यद्यपि इनके ग्रन्थ मूल रूप में उपलब्ध नहीं है किन्तु इनके परवर्ती लेखकों ने इनके ग्रन्थों के उद्धरणों को लेकर जिन ग्रन्थों की रचना की, उनसे पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। इस दृष्टिकोण से उपर्युक्त लेखकों का महत्त्व अधिक है।

  सिकन्दर के बाद- सिकन्दर के भारत से लौट जाने के पश्चात् बहुत से यूनानी लेखक, राजदूत या यात्री के रूप में भारत आये। कुछ लेखकों ने सिकन्दर के अनुयायियों के आधार पर ही ग्रन्थ-रचना की, जिससे भारतीय इतिहास की प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है। इन लेखकों में मेगस्थनीज, प्लिनी,  टॉलमी, डायमेकस, डायोडारस, प्लूटार्क, एरियन, कार्टियस, जस्टिन, स्ट्रेबो आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है।

  मेगस्थनीज यूनानी शासक सेल्यूकस के राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था। मेगस्थनीज कुछ दिनों तक (संभवत: 6 वर्षों तक) पाटलिपुत्र में निवास करके वापस लौट गया। उसने भारत की तत्कालीन सामाजिक तथा राजनैतिक परिस्थिति के विषय में बहुत कुछ लिखा है। यद्यपि इसकी मूल पुस्तक उपलब्ध नहीं है किन्तु अन्य ग्रन्थों में इसके उद्धरण प्राप्त होते हैं, जिससे पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री मिलती है। मेगस्थनीज की पुस्तक इण्डिका के सहारे कतिपय यूनानी तथा रोम के लेखकों ने भारतवर्ष का वर्णन किया है।

  राजदूत के रूप में दूसरा व्यक्ति डायमेकस भारतवर्ष आया था। यह सीरिया के राजदरबार से आया था और बिन्दुसार के दरबार में कुछ दिनों तक रहा। इसी प्रकार डायोनीसियस भी राजदूत के रूप में भारतवर्ष आया था। उपर्युक्त दोनों लेखकों के मूल ग्रन्थों का कोई पता नहीं चलता। हाँ, इनके परवर्ती लेखकों ने इनके नाम का उल्लेख किया है और साथ ही इनके विवरण का भी अपने ग्रन्थों में प्रयोग किया है, जिसके आधार पर कुछ जाना जा सकता है। अन्य यूनानी लेखकों के केवल नाम तक ही गिनाये जा सकते हैं, क्योंकि उनके विवरण का कोई विशेष ऐतिहासिक महत्त्व नहीं है। जो यात्री भारत के जिस कोने में पहुँच पाया, उसने उस आधार पर ही सम्पूर्ण भारत का चित्रण कर दिया।

  टॉलमी दूसरा लेखक है, जिसका नाम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से विशेष उल्लेखनीय है। लगभग दूसरी शताब्दी . में उसने भारतवर्ष के भूगोल से सम्बन्धित एक पुस्तक लिखी। टॉलमी का दृष्टिकोण पूर्णतया वैज्ञानिक था, अतः इसके विवरण में सत्य का अंश अधिक है। यद्यपि भारत के भूगोल तथा उसके मानचित्र का ठीक-ठीक विचार टॉलमी के मस्तिष्क में नहीं आया था, तथापि उसका प्रयास पूर्णतया असफल नहीं माना जा सकता। टॉलमी के बाद प्लिनी का नाम लिया जा सकता है। इसकी पुस्तक नेचुरल हिस्ट्री का भी इस क्षेत्र में बहुत महत्त्व है। प्लिनी ने भारतवर्ष के पशुओं, पौधों तथा खनिज-पदार्थों का उल्लेख किया है। यह पुस्तक लगभग प्रथम शताब्दी . में लिखी गयी थी। एरियन भी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अधिक महत्त्वपूर्ण है। भारत पर मकदूनिया के विजेता के आक्रमण के विषय में कोई भी भारतीय ग्रन्थ प्रकाश नहीं डालता है। ऐसी अवस्था में यदि उपर्युक्त लेखकों ने अपनी पुस्तकों की रचना की होती तो सिकन्दर के आक्रमण का कोई ज्ञान हमें नहीं प्राप्त हो सकता था। इस तरह इनकी उपयोगिता निर्विवाद है। कर्टियस, जस्टिन तथा स्ट्रेबो की देन को भी हम भूल नहीं सकते। उनके विवरण में चाहे जितना भी अतिरंजन हो, चाहे जितनी भी काल्पनिक उड़ान हो, पर वे हमारे इतिहास के उलझे प्रश्नों को सुलझाने या उनका आंशिक ज्ञान कराने में निश्चय ही सहायक होते हैं। एक अज्ञात लेखक की पुस्तक इरिथियन सागर का पेरिप्लस भी ऐतिहासिक सामग्री प्रस्तुत करती है। भारतीय वाणिज्य पर इससे अधिक प्रकाश पड़ता है जो सम्भवतः अन्य किसी साधन से प्राप्त होता। मिस्र के प्लूस्टस की पुस्तक क्रिश्चियन टोपोग्राफी ऑफ दि यूनिवर्स का भी उतना ही महत्त्व है। इस पुस्तक का रचना-काल लगभग 547 . है।

  चीनी- भारत का बौद्ध धर्म लगभग प्रथम शताब्दी . में चीन पहुँचा तो चीन-निवासियों के हृदय में भारतवर्ष के प्रति एक विशेष रुचि उत्पन्न हो गयी। धार्मिक तथ्यों के अन्वेषन तथा तत्सम्बन्धी ज्ञान की प्राप्ति के लिए चीनी यात्री लालायित हो उठे। उन्हें यह भी अटल विश्वास था कि गौतम बुद्ध की पावन जन्मभूमि निश्चय दर्शनीय तथा आध्यात्मिकता का कोष होगी। इन्हीं आकांक्षाओं से वशीभूत होकर चीनी भारतवर्ष आये और अपनी यात्रा का पूर्ण वृत्तान्त उन्होंने लिपिबद्ध किया। चीनी साहित्य से भारतीय इतिहास के एक लम्बे युग का परिचय प्राप्त हो जाता है। यात्रियों का दृष्टिकोण यद्यपि पूर्णतया धार्मिक था और किसी भी वस्तु को वे इसी दृष्टिकोण से देखते थे तथापि उनके विवरणों में से इतिहास की प्रचुर सामग्री प्राप्त हो जाती है।

  चीन के प्रथम इतिहासकार शुमाशीन ने लगभग प्रथम शताब्दी .पू. में इतिहास की एक पुस्तक लिखी। शुमाशीन की इस पुस्तक से प्राचीन भारत पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है। शुमाशीन के पूर्व अन्य किसी चीनी लेखक ने भारतवर्ष से सम्बन्धित किसी विषय पर प्रकाश नहीं डाला था। जिन चीनी व्यक्तियों का इस सम्बन्ध में विशेष रूप से नाम लिया जा सकता है, वे तीन यात्री फाह्यान, ह्वेनसांग तथा इत्सिंग हैं।

  फाह्यान 399 . में यात्रा की कठोर यातनायें सहता हुआ भारतवर्ष आया। लगभग 15-16 वर्ष तक यह धर्म-जिज्ञासु भारतवर्ष में रहा और बौद्ध धर्म-सम्बन्धी तथ्यों का ज्ञानार्जन करता रहा। उस समय भारतवर्ष में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासन था। उसने गंगावर्ती प्रान्तों के शासन-प्रबन्ध तथा सामाजिक अवस्था का पूर्ण विवरण लिपिबद्ध किया। फाह्यान की पुस्तक आज भी अपने मूल रूप में प्राप्य है। वह धार्मिक विषयों के अतिरिक्त, धर्मनिरपेक्ष विषयों की ओर बहुधा उदासीन रह गया, जिससे उसका विवरण अधूरा-सा लगता है। पर बौद्ध धर्म के विषय में फाह्यान ने जो कुछ लिखा है वह पर्याप्त है। फाह्यान बौद्ध-सिद्धान्तों, परिपाट्टियों, नियमों तथा उसकी प्रगतियों के विषय में हमें पर्याप्त सामग्री प्रदान करता है।

  चीनी यात्रियों में ह्वेनसांग का स्थान अधिक ऊँचा है। यह लगभग 629 . में भारतवर्ष आया। उस समय हर्षवर्धन भारत का सम्राट् था। ह्वेनसांग बड़ा ही जिज्ञासु एवं उत्साही व्यक्ति था। उसने अपने जीवन के सोलह वर्ष भारतवर्ष के मठों, विहारों, तीर्थस्थानों तथा विश्वविद्यालयों के दर्शन में बिताये। केवल दक्षिणी भारत को छोड़कर ह्वेनसांग ने लगभग सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया। वह राज सभाओं में भी गया। इसने पाश्चात्य संसार के देश नामक ग्रन्थ की रचना की। हर्षवर्धन के शासन-काल की राजनैतिक तथा सामाजिक अवस्था का बहुत कुछ परिचय ह्वेनसांग की पुस्तक से प्राप्त हो जाता है। धार्मिक अवस्था का तो इसने बहुत ही स्पष्ट वर्णन किया है। फाह्यान तथा इत्सिंग ने अपने समय के सम्राटों का नाम तक नहीं लिया है, जबकि ह्वेनसांग ने हर्षवर्धन तथा उसके समसामयिक अन्य राजाओं के विषय में बहुत कुछ लिखा है। जिन-जिन राज्यों से होकर उसने अपनी यात्रा समाप्त की, उन सबका संक्षिप्त वर्णन उसने किया, साथ ही ह्वेनसांग ने सम्पूर्ण भारत की सामान्य अवस्था पर भी विशेष प्रकाश डाला। ह्वेनसांग के वर्णन के अभाव में सातवीं शताब्दी . का भारतीय इतिहास सम्भवतः इतना अधिक सुलझा हुआ होता-कम से कम हर्षकालीन सामाजिक तथा धार्मिक अवस्था के बोध के लिए तो हमें काफी भटकना पड़ता। अन्य सामग्रियों के साथ सामग्रियों के साथ तो ह्वेनसांग के वृतांत का अध्ययन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है।

  लगभग 673-95 . के बीच इत्सिंग नामक एक अन्य चीनी ने भारतवर्ष की यात्रा की। इसने भारतवर्ष की तत्कालीन धार्मिक अवस्था (विशेषकर बौद्ध धर्म की अवस्था) का सजीव चित्रण किया है। इसका वर्णन यद्यपि ह्वेनसांग के समक्ष हल्का पड़ता है, पर फाह्यान के वर्णन से इसकी उपयोगिता कम नहीं है।

  इन तीन सुप्रसिद्ध यात्रियों के अतिरिक्त कुछ अन्य चीनी लेखकों से भी भारतीय इतिहास की सामग्री प्राप्त होती है। उन लेखकों में ह्वेली अधिक प्रसिद्ध है। यह ह्वेनसांग का मित्र था। इसने ह्वेनसांग की जीवनी लिखी, जिसके अध्ययन से भारतीय इतिहास की कुछ सामग्री प्राप्त होती है।

  तिब्बती- तिब्बती लेखक लामा तारानाथ के ग्रन्थों कंग्युर तथा तंग्युर से भी पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। वास्तव में, चीनी तथा तिब्बती लेखकों से ही मौर्यकाल के उपरान्त से लेकर शक, पार्थियन तथा कुषाण आदि के काल तक के अधिकांश इतिहास का ज्ञान प्राप्त होता है।