। प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत।
। Source of Ancient Indian History। Part-1।

→ प्राचीन भारत का इतिहास लिखने में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि हमारे इतिहास के स्त्रोतों में भौतिक घटनाओं के लेखे-जोखे का महत्त्व अलग से नहीं पहचाना गया है। प्राचीन भारत के साहित्य में आख्यान, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं वंश-विस्तार आदि अनेक विषयों का समावेश होता है। भारतीय दृष्टिकोण हमेशा से आध्यात्मिक रहा है। फिर भी हमारे पास इतिहास जानने के पर्याप्त साधन हैं। हमारे पास विश्व का सबसे विशाल साहित्य है जो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। परवर्तीकाल में हमारी बहुत-सी साहित्यिक सामग्री आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दी गई थी।
→ भारतीय इतिहास की सामग्री का इतना बाहुल्य है कि उस अथाह सामग्री-सागर में प्रक्षिप्तांशों, प्रतिवादों तथा अत्युक्तियों का अभाव नहीं है। उन्हें इतिहास का मूलाधार तथा इतिहास जानने के साधनों का माध्यम बना कर जीवन-पर्यन्त कोई भी अन्वेषण कर सकता है। कुछ काव्यात्मक, किन्तु यथार्थ रूप में प्राचीन काल की लिखित सामग्रियों की अथाह सिन्धु और ऐतिहासिक घटनाओं की मणियों से उपमा दी जा सकती है। समुद्र में प्रत्येक स्थान पर मणियाँ नहीं हैं और सभी मणियाँ मूल्यवान भी नहीं हैं। ठीक इसी प्रकार प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में प्राचीन इतिहास निहित है। प्राचीन भारतीय कलाकारों की कृतियाँ भी कम नहीं, जिनसे हमारे प्राचीन इतिहास का बोध हो सके। मूर्तिकला, चित्रकला, भवन-निर्माण–कला तथा अन्य ललित कलाओं के उत्कृष्ट उदाहरण आज भी अपनी भग्नावस्था में हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति की याद दिलाते हैं।
→ किसी भी देश के इतिहास के केवल दो साधन होते हैं-पहला साहित्यकारों की कृतियाँ तथा दूसरा विभिन्न कलाकारों की कृतियाँ भारतीय इतिहास के साधनों को भी इन्हीं दो भागों में विभाजित किया जा सकता है- साहित्यिक तथा पुरातात्त्विक।
1. धार्मिक साहित्य तथा
2. धर्मनिरपेक्ष साहित्य
3. धार्मिक साहित्य भी दो प्रकार का है-
4. ब्राह्मण ग्रंथ तथा
5. अब्राह्मण ग्रन्थ (बौद्ध तथा जैन ग्रन्थ)
1. ऐतिहासिक
2. अर्द्ध-ऐतिहासिक
3. विदेशी विवरण
4. जीवनियाँ तथा
5. कल्पना-प्रधान एवं गल्प साहित्य (विशुद्ध साहित्य)

साहित्यिक सामग्री
धार्मिक साहित्य, ब्राह्मण ग्रन्थ
वेद
→ वेद आर्यों के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। प्राचीनता तथा महानता के कारण ही ये मानव-रचित न होकर ईश्वर-प्रदत्त माने गये हैं। वेद चार हैं- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद। चारों वेदों की उपयोगिता इतिहास-अन्वेषण में आंशिक रूप में वांछनीय है, किन्तु ऋग्वेद, जो प्राचीनतम है, इस विषय में अधिक लाभप्रद सिद्ध हुआ है। प्राचीन काल में आर्य किस प्रकार और कहाँ तक भारतवर्ष में अपना प्रसार कर सके थे, अनायाँ से उनके संघर्षों का वर्णन, सप्तसिन्धु का गुणगान आदि ऋग्वेद से ही प्राप्त होता है। इस आदि ग्रन्थ के अभाव में सम्भवत: आर्यों के विस्तार का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त करना कुछ कठिन कार्य हो जाता।
ब्राह्मण
→ वैदिक मन्त्रों तथा संहिताओं की गद्य टीकाओं को ब्राह्मण कहा जाता है। प्राचीन ब्राह्मण ऐतरेय, पंचविंश, शतपथ, तैत्तरीय आदि विशेष महत्त्वपूर्ण है। ऐतरेय के अध्ययन से ही राज्याभिषेक तथा कुछ प्राचीन अभिषिक्त राजाओं के नामों का ज्ञान प्राप्त होता है। इनकी सूचनाओं को अन्य सामग्रियों की सहायता से इतिहासपरक बनाया जा सकता है। इसी प्रकार शतपथ, भारत के पश्चिमोत्तर के गान्धार, शाल्य तथा केकय आदि और प्राच्य देश कुरु, पांचाल, कौशल तथा विदेह पर प्रकाश डालता है। सुप्रसिद्ध आर्य राजा परीक्षित तथा उसके काफी बाद तक के भारतीय इतिहास का ज्ञान ब्राह्मणों द्वारा बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है।
उपनिषद्
→ उपनिषदों में वृहदारण्यक, छान्दोग्यादि अधिक प्राचीन हैं। इन ग्रन्थों से बिम्बिसार के पूर्व का इतिहास जानने में सहायता ली जा सकती है। परीक्षित, उसके पुत्र जनमेजय तथा बाद के राजाओं का उल्लेख उपनिषदों से प्राप्त होता है, जिससे यह स्वीकार किया जा सकता है कि उनकी रचना परीक्षित के कुछ बाद और बिम्बिसार से पहले हुई होगी। वास्तव में, ब्राह्मणों तथा उपनिषदों के सम्मिलित अध्ययन से ही परीक्षित से लेकर बिम्बिसार तक के इतिहास पर कुछ सोचा जा सकता है। उपनिषदों की दार्शनिकता को ध्यान में रखते हुए यह दावे से कहा जा सकता है कि प्राचीन आर्यों का दर्शन अन्य सभ्य देशों के दर्शन से कहीं आगे बढ़ा था। प्राचीन आर्यों के आध्यात्मिक विकास का पूर्ण ज्ञान उपनिषदों से ही प्राप्त होता है। प्राचीन काल की धार्मिक अवस्था, चिन्तन तथा नैतिक विकास के ये जीते-जागते उदाहरण है। वेदों तथा ब्राह्मणों की महानता को ये अधिक शक्तिशाली बना देते हैं।
वेदांग
→ वैदिक अध्ययन के निमित्त विशिष्ट विद्याओं की शाखाओं का जन्म हुआ जो वेदांग के नाम से विख्यात हैं। मुण्डक उपनिषदक में छः वेदांगों का उल्लेख किया गया है- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दशास्त्र तथा ज्योतिष। वेदांग की छ: शाखाओं से ही वैदिक पाठ को सरल एवं सुबोध बनाया गया। आगे चलकर इन विषयों के पठन-पाठन में कुछ परिवर्तन हुए और इस प्रकार वैदिक शाखाओं के अन्तर्गत ही उनका पृथक्-पृथक् वर्ग स्थापित हो गया। इन्हीं वर्गों का पाठ्य ग्रन्थों के रूप में सूत्रों का निर्माण हुआ। कल्पसूत्रों को चार भागों में विभाजित किया गया। महायज्ञों से सम्बन्धित सूत्रों को श्रौतसूत्र, गृह-संस्कारों पर प्रकाश डालने वाले सूत्रों को गृह्यसूत्र, धर्म अथवा नियमों से सम्बन्धित सूत्रों को धर्मसूत्र और यज्ञ एवं हवनकुण्डों की क्रमश वेदी एवं नाप आदि से सम्बन्धित सूत्रों को शुल्वसूत्र कहा गया। वेदांग का यह विस्तृत क्षेत्र तत्कालीन धार्मिक अवस्था का एकमात्र निर्देशक है। इन्हीं सूत्रों में सामाजिक अवस्था का भी ज्ञान प्राप्त हो जाता है। किन्तु कठिनाई यह है कि ये इतने विस्तृत तथा अथाह सागर की भाँति हैं कि इनमें से ऐतिहासिक तथ्यों को खोज निकालना सरल कार्य नहीं। ऋग्वेद से लेकर सूत्रों की रचना तक का समय लगभग दो हजार ई.पू. से पाँचवीं शताब्दी ई.पू. तक माना जाता है। इस लम्बे अरसे का इतिहास इसी वैदिक साहित्य से प्रकाशित होता है।















