Ancient History । Chapter-9 P-2


नगर-योजना एवं स्थापत्य कला: सिंधु घाटी सभ्यता

Town-Planning and Architecture: Indus Valley Civilization। Part-2



वृहत स्नानागार- 

  मोहनजोदड़ो की सबसे महत्त्वपूर्ण इमारत महास्नानागार है। यह बौद्ध स्तूप के लगभग 57.9 मीटर दूर स्थित है। मार्शल के अनुसार, मध्य प्रकाल में उसका निर्माण हुआ। गढ़ी टीले पर स्थित यह वास्तु अवशेष सम्पूर्ण रूप में 180 फीट उत्तर-दक्षिण तथा 108 फीट पूर्व से पश्चिम के विस्तार में फैला हुआ है। पूर्णतः पक्की ईंटों से निर्मित वृहत् स्नानागार मध्य भाग में 39 फीट 3 इंच लम्बा, 23 फीट 2 इंच चौड़ा तथा 8 फीट गहरा है। प्रवेश की सीढ़ियाँ 9 इंच चौडी तथा 8 इंच ऊंची हैं, प्रत्येक सीढ़ी के ऊपर लकड़ी के पटिये आबद्ध किये गये थे। सीढ़ियों की समाप्ति पर 39" × 16" क्रमश: चौड़ी एवं ऊंची एक पीठिका है और इसके दोनों ओर सीढ़ियां हैं।

  इसका फर्श पूरी तरह समतल नहीं है अर्थात् दक्षिण-पश्चिम की ओर ढाल लिए हुए है। इसी ओर कोने में एक वर्गाकार मोरी (छेद) पानी के निकास हेतु बनाई गई है, सम्भवत: समय-समय पर इसकी सफाई की जाती रही होगी। सीढ़ी के अन्तिम भाग में नीचे नाली 23.5 × 8.26 सेमी. क्रमश: चौड़ी एवं गहरी है। इसके फर्श को जल निरोधक बनाये जाने हेतु बिटुमिन एवं जिप्सम का प्रयोग किया गया। दो इंटों के बीच बहुत कम दूरी पाई गयी। इसकी दीवार में भी तराशी गई ईंटों का प्रयोग किया है एवं इस तरह की एक मीटर मोटी दीवार का निर्माण देखा गया है। इसमें प्रयुक्त ईंटें 25.78 × 12.95 × 5.95 सेमी. या 27.94 × 13.1 × 5.65 से.मी. आकार की हैं। इस दीवार के पिछले भाग में 2.54 से.मी. मोटा बिटुमिन लगाया गया और उसे गिरने से बचाने के लिए उसके पीछे भी पक्की ईंटों की दीवार बनाई गई। मार्शल का कथन है कि उस समय उपलब्ध निर्माण सामग्री से, इससे सुन्दर और मजबूत निर्माण की कल्पना करना कठिन है।

  स्नानागार के पूर्व में निर्मित 6-7 कमरों के मध्य एक कक्ष में अण्डाकार कुआ है जिसके पानी से स्नानागार भरा जाता था। इसके तीन ओर कई प्रकोष्ठ या कमरे (दरीचियाँ) बने हुए हैं तथा दक्षिण की ओर एक लम्बा प्रकोष्ठ है जिसके दोनों ओर कमरे हैं। उत्तर की ओर बड़े-बड़े आकार के आठ कक्ष इसी प्रकार हैं। दरीचियों या प्रकोष्ठों के ऊपर एक मंजिल और रही होगी क्योंकि उत्तरी भाग के कमरों के पूर्व में कुछ सीढ़ियों के अवशेष पाये गये हैं। प्रत्येक कक्ष 9.5 फीट लम्बा तथा 6 फीट चौड़ा था। ये कमरे भी पक्की ईंटों से बनाये गये, जिनमें छोटी-छोटी नालियां भी बनी थीं। विद्वानों की मान्यता है कि ऊपर के भाग में सम्भवत: पुजारी वर्ग रहा करता होगा। स्नानागार से सम्बद्ध कक्षों के द्वार बिल्कुल सामने होकर दायें या बायें की ओर हैं, जिससे आन्तरिक भाग दृष्टिगोचर नहीं हो पाता। सम्भवत: इन कमरों का उपयोग, वस्त्र आदि बदलने के लिए किया जाता होगा।

  उक्त स्नानागार में लम्बवत ईंटों की चिनाई जिप्सम एवं बिटुमिन के प्लास्टर के रूप में प्रयोग आदि सैन्धव लोगों के अनुपम वास्तु शिल्प के एक नवीन प्रयोग का द्योतक है। सम्भव है कि महास्नानागार सैन्धव जनों की किसी धार्मिक प्रवृत्ति का परिचायक हो क्योंकि वर्तमान में भी मन्दिरों के साथ या स्वतन्त्र रूप में इस प्रकार के कुण्डों का महत्त्व बना हुआ है।


सभा भवन- 

  मोहनजोदड़ो में स्तूप टीले से कुछ दूर दक्षिण में एल एरिया में एक विशाल भवन था। मैके की धारणा है कि यह शहर के आर्थिक जीवन से सम्बद्ध था। इसे कुछ विद्वानों ने सभा मण्डप अथवा विद्यालय भवन माना है। गढ़ी टीले पर स्थित 27.43 मीटर का यह वर्गाकार भवन जो मूलत: बीस स्तम्भों पर आधारित था, ये स्तम्भ चार पंक्तियों में विभक्त है और प्रत्येक पंक्ति में पांच स्तम्भ हैं इमारत तक पहुँचने के लिए उत्तरी छोर के मध्य से रास्ता था। इसकी फर्श भली-भाँति बिछाई गई ईंटों द्वारा निर्मित की गयी, जो कई भागों में विभक्त थी। इनका उपयोग सम्भवत: बैठने के लिए किया जाता होगा। इस तरह के निर्माण की तुलना मार्शल ने बौद्ध गुहा मन्दिरों से की है जिनमें बौद्ध भिक्षु लम्बी पंक्ति में आसीन होते थे। मैके, इसे शहर के आर्थिक जीवन से जोड़ते हुए बाजार भवन (हाल) मानते हैं, जहाँ पर दुकानें लगाने के लिए स्थायी रूप से स्थान (स्टाल) बनाये गये थे। व्हीलर ने इसके फारसी दरबारे आम जैसी इमारत होने की ओर संकेत किया है। दीक्षित इसे वाद-विवाद स्थल मानते हैं।


लोथल डॉकयार्ड- 

  सैन्धव सभ्यता का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थल लोथल सौराष्ट्र (गुजरात) क्षेत्र में है। यह नगर भी हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो के समान सुनियोजित था, सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं। सामान्यतः नगर को दो भागों-गढ़ी एवं निचले नगर के रूप में विभक्त किया जा सकता है। साधारणतया भवन कच्ची ईंटों से निर्मित किये गये परन्तु गोदी (डॉकयार्ड)एवं कुछ महत्त्वपूर्ण भवनों का निर्माण पकाई हुई ईंटों से किया गया। इसके अतिरिक्त स्नानागार एवं नालियाँ आदि के लिए भी पक्की ईंटें उपयोग में लाई गई। लोथल गढ़ी 117 मीटर पूर्व और पश्चिम में तथा 136 मीटर उत्तर तथा 111 मीटर दक्षिण की ओर है। इसमें एक भवन 126×30 मीटर का, ऐसे स्थान पर स्थित था जहाँ से नौकाघाट, भण्डारगृह तथा नावों के गमनागमन पर भली भाँति नियन्त्रण रखा जा सकता था। एस.आर. राव को नगर उत्खनन के दौरान नगर के बाहरी भाग में एक डॉकयार्ड मिला है जो भोगावों एवं साबरमती नदी के तट पर स्थित सैन्धव सभ्यता का प्राचीन बन्दरगाह था।