Ancient History । Chapter-10 P-1


समाज एवं धर्म- सिन्धु घाटी सभ्यता

Society and Religion- Indus Valley Civilization। Part-1



समाज

  सिंधु सभ्यता में चार प्रजातियों का पता चलता है-
1.  भूमध्यसागरीय,
2.  प्रोटोआस्ट्रेलियाड,
3.  मंगोलाइड,
4.  अल्पाइन

  सबसे जयादा भूमध्यसागरीय प्रजाति के लोग थे। सिन्धु का समाज संभवत: चार वर्गों में विभाजित था- योद्धा, विद्वान्, व्यापारी और श्रमिक। स्त्री-मृण्मूर्तियों की संख्या देखते हुए ऐसा अनुमान किया जाता है कि सिंधु सभ्यता का समाज मातृसत्तात्मक था। हड़प्पा सभ्यता के लेाग युद्ध प्रिय कम और शांति प्रिय अधिक थे। हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो में दो तरह के भवन मिलने के आधार पर लोग कहते हैं कि बड़े घरों में सम्पन्न लोग रहते थे तथा छोटे घरों में मजदूर, गरीब अथवा दास रहते थे अर्थात् समाज दो वर्गों-सम्पन्न एवं गरीब में विभाजित था।


वस्त्राभूषण- 

  अधिक संख्या में पुरुषाकृतियाँ सैन्धव स्थलों से प्राप्त नहीं हुई हैं एवं जो उपलब्ध हुई हैं वे अधिकांशतः खण्डित हैं, अत: उनसे पुरुषों के परिधान पर विशेष प्रकाश नहीं पड़ता। मोहनजोदड़ो से प्राप्त घीया पत्थर की मानव मूर्ति उपलब्ध हुई है जिसे योगी की मूर्ति कहा गया है। इस मूर्ति के अवलोकन से प्रतीत होता है कि पुरुष एक शाल का प्रयोग करते थे जिससे बायें कन्धे को ढकते हुए दाहिने हाथ के नीचे से निकाला जाता था। उपरोक्त शाल पर त्रिखण्डीय अलंकरण देखा जाता है। इस प्रकार के चित्रित वस्त्रों का प्रयोग सम्भवत: अन्य लोगों द्वारा भी किया जाता होगा।

  स्त्रियों के वस्त्राभूषण के विषय में विपुल संख्या में प्राप्त मृण्मूर्तियों से अनुमान लगाया जा सकता है। इस प्रकार की मूर्तियों को मातृदेवी की मूर्तियाँ कहा गया है। इनके शरीर का ऊपरी भाग वस्त्रहीन दिखाया गया है और अधोभाग में घुटनों तक का घेरदार वस्त्र मिलता है। थपलियाल एवं शुक्ल के अनुसार, ऐतिहासिक काल में इस तरह के अधोवस्त्र गुप्तकालीन मृण्मूर्तियों एवं अजन्ता की चित्रकला से मिलते हैं। इस घेरदार वस्त्र को कमर पर करधनी द्वारा आबद्ध किया जाता था और सामने अथवा बकसुए द्वारा कसा जाता था। कुछ स्त्री-मूर्तियों के सिर पर आकृति की एक विचित्र शिरोभूषा दिखाई देती है। कुछ आकृतियों के दोनों ओर डलिया जैसी वस्तु रखी दिखाई पड़ती है। स्त्रियों में आकर्षक विन्यास का प्रचलन था।

  मोहनजोदडो से प्राप्त कांस्य मूर्ति का अत्यन्त आकर्षक है। सैन्धव जन आभूषण प्रिय थे, आभूषणों का एवं पुरुषों द्वारा समान रूप से किया जाता था। बहुमूल्य गुरियों से आभूषणों का उपयोग विशेष रूप से प्रचलित रहा होगा। हड़प्पा से 6 लड़ी का सोने के मनकों का हार मिला है। हड़प्पा से एक बोतल मिली है काले रंग की वस्तु प्राप्त हुई है जो काजल का प्रतीक है।


खानपान- 

  सैन्धव लोगों के खान-पान के विषय में हमें बहुत कम जानकारी है। पुराविदों की मान्यता है कि सैन्धव लोग गेहूँ एवं जौ खाते थे, किन्तु कालीबंगा एवं निकटवर्ती प्रदेश के लोगों को जौ से ही सन्तुष्ट रहना पड़ता था। गुजरात के रंगपुर, सुरकोतदा आदि स्थानों के निवासी चावल और बाजरा खाना पसन्द करते थे। तिल एवं सरसों के तेल एवं सम्भवत: घी का भी प्रयोग किया जाता था।