। नगर-योजना एवं स्थापत्य कला: सिंधु घाटी सभ्यता।
। Town-Planning and Architecture: Indus Valley Civilization। Part-1।

→ उत्कृष्ट नगर नियोजन एवं स्थापत्य कला सिन्धु सभ्यता की प्रमुख विशेषता थी। सैन्धव लोगों का सौन्दर्य बोध उनकी शिल्प कला में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से मुखरित हुआ है। इस सभ्यता के अधिक स्पष्ट एवं विपुल रूप में अवशेष मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, चाँहुदड़ो एवं लोथल आदि से प्राप्त हुए हैं। सैन्धव लोग सभ्य, उच्च कोटि के अभियन्ता एवं वास्तुशिल्पज्ञ थे। प्रमुख नगरों का निर्माण उन्होंने नियोजित योजना के आधार पर किया था। सैन्धव जनों ने अपने नगरों के निर्माण में शतरंज पद्धति (चेशबोर्ड) को अपनाया जिसमें सड़के सीधी एवं नगर सामान्य रूप से चौकोर होते थे। सड़कें बिछाने की समस्या मकानों के निर्माण से पहले ही हल कर दी जाती थी। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण जाता था एवं दूसरा मार्ग पूरब से पश्चिम उसे समकोण पर काटता था।
1. मनसा क्षेत्र (भटिण्डा)
2. बहावलपुर क्षेत्र (N.W. Frontier)
3. कच्छ क्षेत्र (गुजरात)।
→ मोहनजोदड़ो में गढ़ी और निचले नगर के बीच सिंधु नदी की एक शाखा बहती थी। लोथल और सुरकोतड़ा में यह विभाजन नहीं था। एक ही सुरक्षा दीवार से वहाँ गढी एवं निचला नगर घिरे थे। धोलावीरा एक ऐसा शहर है, जिसमें नगर तीन भागों में विभाजित था। बनवाली में नाली नहीं पायी गयी है। एक कुषाणकालीन स्तूप मोहनजोदड़ो के टीले पर मिला है। मकानों का औसत आकार 30 फीट है। ईंटो का आकार 4:2:1 है। लोथल आयताकार चबूतरे पर बसा था। सुत्कोगेडोर में एक विशाल दुर्ग एवं परकोटों से घिरे एक छोटे आवास स्थल का पता चला है। सुक्कुर में पत्थर का औजार बनाने वाली फैक्ट्री मिली है। सुक्कुर से ही चूना पत्थर के कारखाने का साक्ष्य मिला है। मकानों के अलावा सैन्धव के कुएं, अपनी ईंटों की सुदृढ़ चिनाई के लिए प्रसिद्ध हैं। सभ्यता के अन्तिम काल में सम्भवत: पूर्व निर्मित कुओं की मरम्मत करके ही उनका उपयोग किया गया।
→ उस युग के प्रत्येक कुँए प्रायः अंडाकार होते थे एवं उनके उपरी भाग पर चतुर्दिक दीवार बनी रहती थी। पानी रस्सी से निकाला जाता था, रस्सी के घर्षण के चिह्न कुओं की मुण्डेर पर देखे गये हैं। कुओं के अन्दर सीढ़ियां बनी होती थीं जिनकी सहायता से अन्दर प्रवेश करके सफाई आदि की जाती रही होगी। कुओं के निर्माण में षड्जाकार ईंटें प्रयुक्त की गई थीं। कुओं के पास छोटे-छोटे गड्ढे पाये गये, सम्भवत: घडे रखने हेतु इनका उपयोग किया जाता रहा होगा। इसके अलावा कुछ स्थापत्य कला के प्रसिद्ध उदहारण हैं-
सार्वजनिक भवन-
→ हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा एवं लोथल आदि में दुर्ग या प्राचीर के अवशेष पाये गये हैं। शहर दुर्गीकृत थे अर्थात् सुरक्षा की दृष्टि से प्राचीर से घिरे हुए थे। रावी नदी के निकट हड़प्पा के अवशेष पाये गये हैं। हड़प्पा का पश्चिमी टीला गढी एवं पूर्वी टीला निचला नगर था। गढ़ी आकार में लगभग समानान्तर चतुर्भुज है जो उत्तर से दक्षिण दिशा में 420 मीटर एवं पूर्व से पश्चिम 196 मीटर है। इसकी सर्वाधिक ऊंचाई लगभग 12 से 15 मीटर के बीच है और इसके निर्माण में मिट्टी और कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है।
→ सर्वप्रथम सुरक्षा के लिए एक सुदृढ़ दीवार बनाई जाती थी। यह दीवार निम्नस्तर पर 12.19 मीटर चौड़ी एवं ऊंचाई पर 10.66 मीटर थी जिसमें क्रमश: ढाल दृष्टिगत होता है। इसका निर्माण कच्ची ईंटों और मिट्टी से किया गया था, किन्तु बाह्य भाग पर पक्की ईंटें लगाई गई। प्रारम्भ में ईंटों की दीवार को सीधे बढ़ाया गया परन्तु बाद में उसे तिर्यक बना दिया गया था। गढ़ी की बाहरी दीवार पर कुछ दूरी से बुर्ज बने थे। उनमें से कुछ दीवार से अधिक ऊंचे थे। गढ़ी का भीतरी मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर की ओर था और पश्चिमी द्वार घुमाव लिए था जिसके साथ ही सीढ़ियाँ भी थीं।
भण्डारण व्यवस्था-
→ हड़प्पा की एक इमारत, जिसे विद्वानों ने अन्नागार की संज्ञा दी है, परिमाण में बड़ी है। इस विशाल अन्नागार का निर्माण खण्डों में किया गया था। ऐसे बारह खण्ड हैं जो छ: छ: की दो पंक्तियों में विभक्त हैं। इन दो पंक्तियों के मध्य सात मीटर की दूरी है। प्रत्येक खण्ड का क्षेत्रफल लगभग 15.24 × 6.10 मीटर है। इन भण्डारगृहों का प्रमुख प्रवेश द्वार रावी नदी की ओर खुलता था, नदी मार्ग से भण्डारों में संग्रहित किया जाने वाला अनाज आता जाता रहा होगा। उक्त भण्डारों के तल तक पहुँचने हेतु एक ढाल युक्त मार्ग बनाया हुआ था। ऐसा भण्डारों में रखी जाने वाली सामग्री के निकालने एवं पहुँचाने में सुगमता की दृष्टि से किया जाता होगा। भण्डारों के फर्श में लकड़ी के शहतीर का उपयोग किया जाता था और इनके बीच में जगह छोड़ी जाती थी जिससे हवा का प्रवेश हो सके एवं जमीन की नमी से अनाज सुरक्षित रहे। फर्श की दरारों में पाया गया गेहूँ एवं जौ का भूसा यह सिद्ध करता है कि इसका उपयोग अनाज को सुरक्षित रखने हेतु किया जाता था। हड़प्पा का यह विशाल भण्डार 168 मीटर लम्बा तथा 134 फीट चौड़ा था। अन्नागार की छत के लिए लकड़ी की लट्ठों (टॉइल्स) का प्रयोग किया जाता था।
→ चार फीट ऊंचे भाग (चबूतरे) पर मोहनजोदड़ो में हड़प्पा के सदृश अन्नागार के अवशेष मिले हैं। स्नानागार के पश्चिम में पक्की ईंटों से निर्मित यह भवन पूर्व से पश्चिमी 45.72 मीटर लम्बा एवं उत्तर से दक्षिण 22.86 मीटर चौड़ा है। सम्भवत: इसमें 27 खण्ड (ब्लॉक) थे जिनके मध्य रिक्त स्थान छोड़ा गया, जिससे वायु का सुगम संचरण होता रहे। इस भवन का मलवा 1950 ई. में व्हीलर ने हटवाया था, उन्होंने इसे अन्नागार की संज्ञा दी है। इसका ऊपरी भाग लकड़ी से बनाया गया था। दीवारें तिरछी बनाई गई थीं। उत्तर दिशा में चबूतरे की दीवार भी तिरछी थी सम्भवत: भारी अन्न को (बोरे आदि) ऊपर चढ़ाने में ढाल की सुविधा की दृष्टि से ऐसा किया होगा।















