
यद्यपि भारतीय संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ को नहीं परिभाषित किया गया है। किंतु, संविधान के अनुच्छेद- 29, 30, 350 (क) और 350 (ख) में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का उल्लेख किया गया है। TMA पाई फाउंडेशन वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक को परिभाषित करने के लिये एक इकाई के प्रश्न पर विचार किया। इसने माना कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण केवल राज्य की जननांकीय के संदर्भ में संभव है, राष्ट्र के स्तर पर नहीं।
भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के अंतर्गत दो प्रकार के अल्संख्यक को शामिल किया गया है-
→ धार्मिक अल्पसंख्यकः राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, 1992 के धार्मिक अल्पसंख्यक के तहत धार्मिक अल्पसंख्यक के अंतर्गत मुसलमानों, सिखों, बौद्धों, पारसियों, ईसाइयों और जैनियों को शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि धर्म के अंतर्गत समुदायों को धार्मिक अल्पसंख्यक की श्रेणी में नहीं रखा जाता है।
→ भाषाई अल्पसंख्यकः यह राज्य-आधारित संकल्पना है, न कि राष्ट्रीय स्तर की। इसके लिये आवश्यक है कि भाषाई अल्पसंख्यकों की पृथक बोली हो, लिपि की मौजूदगी अनिवार्य नहीं है।
→ भारत के संविधान में अल्पसंख्यकों को मूल अधिकारों के तहत अनुच्छेद 25 से 30 के अंतर्गत विशेष रक्षोपाय प्रदान किये गए हैं। अनुच्छेद 29, जहाँ विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति के संबंध में है। वहीं, अनुच्छेद 30 शैक्षिक संस्थानों की स्थापना में राज्य की तरफ से सहायता अनुदान प्राप्त करने की बात करता है।
→ उपर्युक्त प्रावधान किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य के संदर्भ में विरोधाभासी प्रकृति की प्रतीत हो सकता है। क्योंकि, धर्मनिरपेक्ष राज्य के अंतर्गत किसी विशेष धर्म को अन्य धर्मों की अपेक्षा अधिक तरजीह नहीं दिया जाता है।
→ यहाँ की राजनीतिक प्रणाली में बहुसंख्यक समुदाय अल्पसंख्यकों की तुलना में एक लाभप्रद स्थिति में होते हैं। अतः ऐसी स्थिति में अल्पसंख्यकों के लिये विशेष रक्षोपाय करना आवश्यक हो जाता है।
→ भारत में यह भी देखा गया है कि कुछ अल्पसंख्यक समुदाय जैसे- पारसी और सिख आर्थिक रूप सशक्त है। इसके बावजूद इनके लिये विशेष संरक्षण की व्यवस्था है। क्योंकि इनकी आबादी बहुत कम है, अतः ये समुदाय बहुसंख्यकों की तुलना में एक अलाभप्रद अवस्था में होते हैं। इस तरह यहाँ धर्मनिरपेक्षता का परंपरागत अनुपालन अल्पसंख्यकों पर बहुसंख्यकों की सांस्कृतिक मूल्यों को थोपने का कारण बन सकती है।
अतः इन रक्षोपायों के पीछे सरकार की मंशा असमानता उत्पन्न करना एवं देश की धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बाधित करना नहीं है। अपितु, ये लोकतंत्र को समावेशी बनाने के उद्देश्य से उठाए गए हैं।















