Medieval History । Series-I P-7


मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Sources of Medieval Indian History। Part-7



तबकात--अकबरी (Tabaqat-i-Akbari)

  इस किताब को ख्वाजा निजामुद्दीन अहमद (Khvaja Nizam-ud-din Ahmad) ने लिखा था। इसमें भारत में मुसलिम शासन के प्रारंभ से लेकर अकबर के शासन के 29वें वर्ष तक की घटनाओं का वर्णन है। यह तीन भागों में विभाजित है, जिसके पहले भाग में निजामुद्दीन अहमद ने भारत में मुस्लिम शासन और दिल्ली के सुल्तानों के इतिहास की शुरुआत का वर्णन किया है। इसके दुसरे भाग में उसने मुग़ल साम्राज्य के बारे बाबर से लेकर अकबर के शासन के 29वें  वर्ष तक लिखा है। तीसरे भाग में वः राज्यों के बारे में लिखता है, जिसमे उसने मालवा और गुजरात के बारे में विस्तार से लिखा है। तबकात--अकबरी मध्यकालीन इतिहास के एक बड़े हिस्से के विषय में व्यापक ज्ञान प्रदान करता है अतः इसे एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत सामग्री के रूप में माना गया है।


मुंतखाब-उत-तवारीख (Muntakhab-ut-Tawarikh or Tarikh-i-Badauni)

  इस किताब को अब्दुल कादिर बदायूनी (Abdul Qadir Badauni) ने लिखा है, जो अकबर के शासन के दौरान अरबी, फारसी और संस्कृत का एक विद्वान था। बदायूँनी, अबुल फज़ल का छात्र था, और अकबर द्वारा अबुल फज़ल को अधिक सम्मान दिए जाने के कारण वह उससे ईर्ष्या भी करता था। बदायूँनी धीरे-धीरे कट्टरपंथी सुन्नियों के समूह के समर्थक बन गया। इस कारन अकबर उससे नाराज हो गया और उसे दरबार में रहकर विभिन्न ऐतिहसिक लेखों का फारसी में अनुवाद करने को कहा। उसने अपने कई मूल लेखों के अलावा अरबी और संस्कृत के कई ग्रंथों का फारसी में अनुवाद किया है। उसके मूल ग्रंथों में तारीख--बदायूँनी को सबसे अच्छा ऐतिहासिक ग्रन्थ माना गया है।

  तारीख--बदायूँनी भी तीन भागों में विभाजित है, जिसके पहले भाग में बदायूँनी ने सुबुक्तगीन से लेकर हुमायूँ के शासन तक का इतिहास लिखा है। दुसरे भाग में उसने सं 1594 तक के अकबर के शासन का इतिहास लिखा है।

  बदायूँनी गंभीरता से अकबर की धार्मिक नीति की आलोचना करता है। इसलिए उसने जहाँगीर के शासन में इस भाग को सामने लाया। तीसरे भाग में उसने समकालीन संतों और विद्वानों की गतिविधियों और उनके जीवन के बारे में वर्णन किया है। बदायूँनी का अकबर के खिलाफ विवरणउसके पक्षपात को दर्शाता है। परन्तु यह आज भी अकबर के शासन के दूसरे पक्षों को समझने में आधुनिक इतिहासकारों की मदद करता है।


तुजुक--जहाँगीरी (Tuzuk-i-Jahangiri)

  तुजुक--जहाँगीरी सम्राट जहाँगीर की आत्मकथा है। इस संस्मरण में जहाँगीर ने अपने गद्दी पर बैठने से लेकर अपने शासन के 17वें वर्ष तक का वर्णन किया है। उसके बाद उसने यह काम अपने बक्शी, मुतामिद खान (Mutamid Khan) को दे दिया। मुतामिद खां इसे जहाँगीर के शासन के 19वें वर्ष तक ही लिख पाया। अधिकांश मामलों में जहाँगीर ने सच्चाई और विस्तार से लिखा है। उसने अपनी कमजोरियों को भी नहीं छिपाया है।

  जहाँगीर ने अपने बड़े बेटे खुसरौ (Khushrau) के विद्रोह, के बारे में लिखा है। जहाँगीर ने अपने दैनिक जीवन की दिनचर्या, न्याय, अदालत में आयोजित समारोहों, राजपूतों और हिन्दुओं के साथ उसके वयवहार, अपनी यात्राओं, अपने सैन्य अभियानों और नूरजहाँ के साथ उसकी शादी के बारे में लिखा है। उसने जिन स्थानों का दौरा किया था वहां की जलवायु, प्रकृति, पक्षी, पशु, फूल की सुंदरता आदि का वर्णन किया है। उसने चित्रकारी के अपने ज्ञान और रूचि के बारे में भी लिखा है। जहाँगीर के ये सभी वर्णन, जहाँगीर के शासनकाल के दौरान भारत के इतिहास और संस्कृति की जानकारी प्रदान करते हैं।


इकबाई-नामा (Iqbai-nama)

  इकबाई-नामा को मुतामिद खां द्वारा लिखा गया था। इसे तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहले भाग में मुतामिद खां ने आमिर तैमुर के इतिहास से लेकर बाबर और हुमायूँ तक का इतिहास लिखा है, दुसरे भाग में उसने अकबर के शासन और तीसरे भाग में जहाँगीर के शासन का वर्णन किया है।

  मुतामिद खान को जहाँगीर ने आश्रय दिया था, तो उसने जहाँगीर के व्यक्तित्व को अतिरंजित किया है। शाहजहाँ के शासन में उसने बेगम नूरजहाँ की गतिविधियों के खिलाफ असंतोष व्यक्त किया है। उसका वर्णन पक्षपात पूर्ण लगता है, फिर भी यह पुस्तक महत्पूर्ण है।