। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत।
। Sources of Medieval Indian History। Part-5।

तारीख-ए-मुबारक शाही (Tarikh-i-Mubarak Shahi)
→ इस किताब को याहिया बिन अहमद सरहिन्दी (Yahya bin Ahmad of Sirhind) ने लिखा है, जिसे सय्यद वंश (Sayyid ruler) के शासक मुबारक शाह (Mubarak Shah) का आश्रय प्राप्त था। याहिया बिन अहमद ने इस किताब का प्रारम्भ मुहम्मद गोरी (Muhammad of Ghur) के आक्रमण से शुरू करके, सय्यद वंश के तीसरे शासक मुहम्मद शाह तक का इतिहास लिखा है। सय्यद वंश का इतिहः जानने के लिए यह एकमात्र स्रोत है।
फुतुहात-ए-फिरोजशाही (Futuhat-e-firozshahi)
→ यह फिरोजशाह तुगलक की आत्मकथा है। इस पुस्तक को लिखने का फिरोजशाह का मुख्य उद्देश्य स्वयं को एक आदर्श मुसलिम शासक सिद्ध करना था। इस किताब से उसके प्रशासन सम्बंधित कुछ जानकारियां मिलती हैं।
फुतूह-उस-सलातीन (Futuh-us-Salatin-1349 ई.)
→ यह किताब ख्वाजा अब्दुल्ला मालिक इसामी (Kwaja Abdulla Malik Isami) ने लिखी थी, जो मुहम्मद तुगलक का समकालीन था। जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से दक्कन स्थित दौलताबाद स्थानांतरित की थी, तो इसामी का परिवार भी यहाँ आ गया था। बहमनी साम्राज्य (Bahamani Kingdom) के संस्थापक अलाउद्दीन हसन बहमन शाह (Alauddin Hasan Bahman Shah) ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया था। फुतूह-उस-सलातीन एक कवित के रूप में लिखी गयी है।
→ यह किताब मुहम्मद गजनी के एअज्वंश से लेकर तुगलक वंश तक के इतिहास का वर्णन करती है। यह किताब दक्कन के इतिहास का महत्वौर्ण स्रोत है। इसामी मुहम्मद तुगलक की किसी बात पर नाराज हो गया था, और उसने तुगलक के कई कामो को इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बताया है। बाद के कई इतिहासकारों, जैसे बदायूनी और फिरिस्ता आदि ने अपने लेखन के लिए फुतूह-उस-सलातीन की मदद ली है।
रिहला (Rihla)
→ रिहला का अर्थ होता है यात्रा। इब्न बतूता मोरक्को, अफ्रीका का एक यात्री था। इब्न बतूता (Ibn Battuta) भारत में 14 वर्षों तक रहा। उसने मुहम्मद शाह तुगलक के शासन में 10 वर्षों तक काज़ी का काम किया। सुल्तान ने उससे किसी बात पर नाराज़ होकर उसे निकाल दिया, परन्तु जल्दी ही सम्राट को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने बतूता को चीन की यात्रा पर भेजने का निश्चय किया। इब्न बतूता चीन पहुँच नहीं सका, क्योंकि उसका जहाज रस्ते में ही टूट गया और वह भारत वापस आ गया। यहाँ से वह वापस अपने घर चला गया।
→ यहाँ उसने अपनी यात्राओं का रिहला शीर्षक के अंतर्गत वर्णन लिखा। इब्न बतूता ने सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक और सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन के दौरान की घटनाओं, प्रशासन, मेलों और त्यौहारों, बाजारों, भोजन और भारतीय कपड़े, शहर के जीवन, अदालत, अर्थव्यवस्था, समाज, जलवायु आदि का वर्णन किया है।
→ उसने अपना यह कम अफ्रीका में रहते हुए पूरा किया था और उसे भारत के किसी भी शासक का कोई प्रलोभन और भय नहीं था, इसलिए उसके लेखन को भारतीय इतिहास के एक प्रामाणिक स्रोत-सामग्री के रूप में माना गया है।
तुजुक-ए-बाबरी (Tuzuk-i-Baburi)
→ तुजुक-ए-बाबरी या बाबरनामा बाबर की आत्मकथा है जिसे बाबर ने तुर्की भाषा में लिखा है। मुग़ल काल के दौरान कई लेखकों ने इस किताब का फारसी में अनुवाद किया। इसके बाद इसका कई यूरोपीय भाषाओँ में भी अनुवाद हुआ। तुजुक-ए-बाबरी की प्रशंसा कई इतिहासकारों ने की है, और कुछ ने इसे भारत के वास्तविक इतिहास का एक मात्र स्रोत माना है। इस किताब में न सिर्फ बाबर के जीवन की घटनाओं के विषय में जानकारी मिलती है, बल्कि इससे उसके चरित्र, व्यक्तित्व, ज्ञान, क्षमता, कमजोरी के बारे में भी जानकारी मिलती है। यह कहा जा सकता है की इस किताब में बाबर ने सच्चाई लिखने की पूरी कोशिश की है। बाबर ने अपने दोस्तों के साथ शराब और अफीम के अपने प्रयोग के बारे में भी लिखा है। बाबर ने निष्पक्ष होकर अपने दोस्तों और दुश्मनों के बारे में लिखा। उसने दौलत खान लोदी, इब्राहिम लोदी, आलम खान लोदी, राणा संग्राम सिंह आदि के चरित्र, व्यक्तित्व और उनके कार्यों के बारे में भी लिखा है। उसने अपने जीवन के दौरान किये गए दौरों के दौरान खूबसरत जलवायु, हाड़ों, नदियों, जंगलों, वनस्पतियों और जीव, पेड़ और फूल, प्रकृति की सुंदरता का भी वर्णन किया।
→ तुजुक-ए-बाबरी ने बाबर ने भारत के बारे भी वर्णन किया है। उसने यहाँ की भौगोलिक स्थिति, जलवायु, नदियों, राजनीतिक स्थिति, विभिन्न राज्यों और उनके शासकों के साथ-साथ लोगों के पहनावे, भोजन और रहने की हालत का वर्णन किया है। जब बाबर यहाँ के लोगों के साथ पहली बार संपर्क में आया तो वह भारतीयों और उनके रहने की स्थिति से प्रभावित नहीं था। उसने यहाँ के बारे में लिखा है, "यहां के लोग न तो सुंदर हैं और न ही सुसंस्कृत।“ उसने लिखा है की यहाँ अच्छे घोड़े, कुत्ते, अंगूर, तरबूज या अन्य फल नहीं मिलते हैं, और बाज़ारों में अच्छी रोटी और पका हुआ भोजन भी नहीं मिलता है। यहाँ कोई गर्म स्नान और कोई अच्छा कॉलेज नहीं हैं। लोग यहाँ मोमबत्ती या मशालों का उपयोग नहीं करते, इसके बजे वे तेल के लैम्प का उपयोग करते हैं, जो उनके नौकर ले कर चलते हैं। बड़ी नदियों के बावजूद यहाँ पानी की कमी है। यहाँ के बागानों कोई चारदीवारी नहीं है। घर अच्छी तरह से भी नहीं बने हुए हैं, और उनमे ताजा हवा के लिए कोई व्यवस्था भी नहीं है। किसानों और गरीब लोग लगभग नग्न रहते हैं। यहाँ के पुरुष लंगोट पहनते हैं और महिलाएं सिर्फ एक कपडे से अपने शरीर को ढकी रहती हैं। हालाँकि उसने भारत की विशालता और यहाँ की समृद्धि की प्रशंसा भी की है। उसने भारत की बरसात के मौसम की सराहना की है, लेकिन यह भी लिखा कि, इस मौसम में यहाँ नमी से सब कुछ ख़राब हो जाता है। बाबर ने यहाँ हर तरह के कामगार बड़ी संख्या में उपलब्ध होने और बड़ी संख्या में उनके आगरा, सीकरी, बयाना, धौलपुर, ग्वालियर और कोल पर उसके भवनों पर कम करने के बारे में भी लिखता है। उन्होंने वर्णन किया है कि कामगार के हर समूह, एक खास जाति के थे और हर जाति पीढ़ियों से अपने पेशे का अनुसरण करती थी। बाबर ने यहां अपने दुश्मनों के खिलाफ उसकी लड़ाई और भारत की राजनीतिक स्थिति का वर्णन किया है। उसने दिल्ली, गुजरात, बहमनी, मालवा और बंगाल के मुसलिम शासकों और मेवाड़ और विजयनगर के हिन्दू शासकों का विवरण दिया है। उसने दौलत खान लोदी, इब्राहिम लोदी और राणा संग्राम सिंह के खिलाफ अपनी लड़ाईयों, सैनिकों की संख्या और उनकी सफल रणनीति का विवरण भी दिया है।
→ बाबर के लिखे विवरणों को सही नहीं मन जा सकता, परन्तु उसकी किताब तुजुक-ए-बाबरी आज भी समकालीन इतिहास का महत्वपूर्ण स्रोत है।















