Medieval History । Series-I P-1


मध्यकालीन भारतीय इतिहास के स्रोत

Sources of Medieval Indian History। Part-1



  हमारे पास मध्यकालीन भारतीय इतिहास के पर्याप्त स्रोत हैं। मध्यकालीन शासक अपने यहाँ इतिहासकारों को आश्रय दिया करते थे, जिन्होंने शासकों उनके विजय अभियानों का वर्णन किया है। सल्तनत काल की अपेक्षा मुगलकालीन साहित्य ज्यादा उपलब्ध हैं। ये स्रोत ज्यादातर अरबी फारसी भाषा में लिखें गए हैं। मुगलकाल के ज्यादातर स्रोत फारसी भाषा में लिखे गए हैं। ये इतिहासकार ज्यदातर सुल्तानों और बादशाहों की राजनैतिक और सैनिक गतिविधियों की ही जानकारी देते हैं और इनसे हमें जनता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की जानकारी कम मिलती है, जिसके लिए हमें समकालीन साहित्य स्रोतों और भारत आये यात्रियों के विवरण का सहारा लेना पड़ता है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास की कुछ प्रमुख साहित्यिक रचनाएँ इस प्रकार हैं-


राजतरंगिणी (Rajatarangini)

  राजतरंगिणी 1148 से 1150 के बीच कल्हण द्वारा संस्कृत भाषा में रचा गया ग्रन्थ है। राजतरंगिणी में महाभारत काल से लेकर 1151 . के आरम्भ तक के कश्मीर के प्रत्येक शासक के काल की घटनाओं क्रमानुसार विवरण दिया गया हैं। लेकिन राजतरंगिणी के 120 छंद में राजा कलश, जो कश्मीर के राजा अनंत देव के पुत्र थे, के शासनकाल के दौरान कश्मीर में व्याप्त कुशासन का वर्णन मिलता है। राजतरंगिणी में आठ तरंग यानि अध्याय और संस्कृत में कुल 7826 श्लोक हैं। कल्हण लिखते है की, कश्मीर की घाटी पहले बड़ी झील थी, जिसे कश्यप ऋषि, जो ब्रह्मा के पुत्र, ऋषि मरीचि के पुत्र थे, ने इस घाटी को सुखा दिया। यहाँ का बारामुला शब्द संभवतः वराहमूल से निकला है। कल्हण कश्मीर के पहले इतिहासकार माने जाते हैं, और तत्कालीन भारत के इतिहास के सम्बन्ध में राजतरंगिणी सबसे महत्वपूर्ण और प्रमाणिक स्रोत है। कल्हण के बारे में हमें राजतरंगिणी से ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है। राजतरंगिणी के शुरुआती छंदों से हमें उनके पिता चंपक के बारे में पता चलता है, जो कश्मीर में हर्ष के दरबार के मंत्री थे। राजतरंगिणी में कल्हण ने गोनर्दा के शासन से शुरुआत की है जो महाभारत के युधिष्ठिर के समकालीन थे। परन्तु इसमें प्रमुख रूप से मौर्य शासन से इतिहास शुरू होता है। वह लिखते हैं की श्रीनगर की स्थापना मौर्य सम्राट अशोक, द्वारा की गयी थी और बुद्ध धर्म उनके समय में ही यहाँ पहुंचा और फिर यहाँ से बौद्ध धर्म मध्य एशिया, तिब्बत और चीन सहित कई अन्य आसपास के क्षेत्रों में फैल गया।

  राजतरंगिणी में गोनर्दा प्रथम को कश्मीर का पहला राजा और उसे मगध के जराससम्धा का रिश्तेदार बताया गया है।

  मौर्य साम्राज्य 322 ईसा पूर्व में मगध में चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा स्थापित प्राचीन भारत में, भौगोलिक दृष्टि से व्यापक, शक्तिशाली राजनीतिक और सैन्य साम्राज्य था। उनके पौत्र अशोक महान (273-232 ईसा पूर्व) ने कश्मीर में कई स्तूपों का निर्माण कराया, और अशोक के बाद उसका बेटा जलूका उसका उत्तराधिकारी बना।

  अशोक के किसी वंशज दामोदर के बह हमें बक्ट्रियन कुषाण साम्राज्य के हुष्का, जुष्का और कनिष्क का उल्लेख मिलता है।

  किसी अभिमन्यु नाम के शासक के बाद, हमें गोनर्दा तृतीय द्वारा स्थापित मुख्य गोनंदिया  राजवंश का उल्लेख मिलता है, परन्तु उसकी  उत्पत्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं है। उसके परिवार ने कई पीढ़ियों तक शासन किया था।

  आर्यों के बारे प्रतापदित्य, जिसे किसी विक्रमादित्य का रिश्तेदार बताया गया है, के शासन का उल्लेख है। इसके बाद किसी अन्य परिवार के विजय ने सिंहासन ले लिया।

  इसके बाद आर्य राजा जयेंद्र और सम्धिमति का उल्लेख आता है। कल्हण ने सम्धिमति का गर्मियों के दौरान लिंग की पूजा का भी उल्लेख किया है, यह संभवतः अमरनाथ में बर्फ के शिवलिंग के लिए एक संदर्भ प्रतीत होता है।

  कल्हण ने हूण शासकों तोरमण और मिहिरकुल के शासन का भी जिक्र किया है, परन्तु वह यह नहीं बताते की वे हूण थे, जिसकी जानकारी हमें अन्य स्रोतों से मिलती है।

  हूणों के बाद गोनंदिया वंश के मेघवाहन, का परिवार जो गांधार से वापस आया था, की कुछ पीढ़ियों ने शासन किया। मेघवाहन एक भक्त बौद्ध था और उसके शासन में पशु-वध का निषेध कर दिया गया।

  इसके बाद कार्कोट वंश के शासन का उल्लेख है। जिसके दुर्लभवर्धन, ललितादित्य मुक्तपिदा शासकों ने अपने साम्राज्य को पश्चिमी भारत और मध्य एशिया तक फैलाया। कल्हण ने इन शासकों द्वारा कम्बोजों को हराने का भी जिक्र किया है।

  कार्कोट वंश के बाद उत्पल वंश एवं अंत में लोहार वंश का उल्लेख मिलता है।

  712 . के आस-पास मुसलिम आक्रमणों और 1000 . के आस-पास महमूद गजनी के आक्रमण का राजनैतिक और ऐतिहासिक प्रभावों का भी वर्णन भी मिलता है। कल्हण ने राजा हर्ष के उत्थान और पतन का भी महत्वपूर्ण वर्णन दिया है।