। प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत।
। Source of Ancient Indian History। Part-6।

प्राचीन स्मारक
→ प्राचीन काल की सभ्यता के भग्नावशेष, प्राचीन मानव की कला के महत्त्वपूर्ण कार्य आज उत्खनन द्वारा प्राप्त हुए हैं और उनसे हमारे इतिहास पर पूर्ण प्रकाश पड़ता है। प्राचीन स्मारक के अन्तर्गत कितनी वस्तुएँ आ सकती हैं, यह कहना कठिन है। वास्तव में पुरातत्त्व-सम्बन्धी शेष वर्गों (अर्थात् अभिलेख, मुद्रा तथा ललित कला सम्बन्धी वस्तुओं को छोड़ कर) के अतिरिक्त जो कुछ भी धरती के नीचे या ऊपर कला की वस्तु हो या एक ऐसी वस्तु हो जिसको देखने से हमें अपने प्राचीन इतिहास की याद आये, वह प्राचीन स्मारक में आयेगी। प्राचीन स्मारकों की महत्ता यद्यपि राजनैतिक इतिहास जानने में उतनी नहीं, क्योंकि इसमें राजनैतिक घटनाओं का उल्लेख करना कठिन था। परन्तु, कभी-कभी राजाओं का नाम, उनका वंश और साथ ही अपनी तकनीक के आधार पर उनका अनुमानित काल बताने में ये अधिक सहायक सिद्ध होते हैं। पुरातत्त्ववेत्ताओं को प्राचीन स्मारकों के अध्ययन में कठिनाई का सामना अवश्य करना पड़ता है, किन्तु उस अध्ययन से सभ्यता तथा संस्कृति के जिस पहलू पर जितना प्रकाश पड़ता है, उतना अन्य किसी साक्ष्य से नहीं। साहित्यिक सामग्री किसी काल-विशेष की, किसी विशेष कला की शैली के विषय में बतला सकती है, पर उसका जीता-जागता उदाहरण हमें प्राचीन स्मारकों के रूप में ही प्राप्त होता है। विभिन्न प्रकार के भवन, राजप्रासाद, सार्वजनिक हॉल, जनसाधारण के घर, विहार, मठ, चैत्य, स्तूप, समाधि आदि असंख्य वस्तुएँ अपने मूल रूप में या भग्नावशेष रूप में हमारे पिछले इतिहास को प्रकाशित करती हैं। अपने साधारण रूप में तो ये अपनी कला के विषय में बतलाती हैं, पर इनके विशेष अध्ययन से हम तत्कालीन धार्मिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। पूजा-पद्धति तथा धार्मिक विश्वासों को जानने के लिए जितने सहायक प्राचीन स्मारक हुए हैं, उतना सम्भवत: अन्य कोई सामग्री नहीं।
→ प्राचीन स्मारकों को प्रकाशयुक्त करने में पुरातत्त्व-विभाग ने अधिक धैर्य एवं साहस से काम लिया है। फलस्वरूप मोहनजोदडो, हड़प्पा, तक्षशिला, मथुरा, कोसल, सारनाथ, कसिया, पाटलिपुत्र, नालन्दा, राजगिरि, साँची, भरहुत, लक्ष्मणेश्वर, अगदी, बनवासी, पत्तदकल, चित्तलदुर्ग, तालकड़, हेलेविड, मास्की आदि में जो खुदाईयाँ हुई हैं, उनसे इतिहास के कतिपय अन्ध युगों का ज्ञान प्राप्त हुआ है। मोहनजोदड़ो-हड़प्पा की खुदाइयों ने तो इतिहास का एक नया परिच्छेद ही जोड़ दिया है। इसने तो एक बिलकुल ही नवीन सभ्यता का बोध कराया है खुदाई ने हमारे सांस्कृतिक इतिहास को हजारों वर्ष पीछे ढकेल दिया है। देशी स्मारकों में इसका सर्वोच्च स्थान है। यहाँ के भग्नावशेषों से हमें उस अतीत संस्कृति की स्मृति आ जाती है जो विश्व की अन्य सभ्यताओं को चुनौती दे रही थी।
→ भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी कुछ ऐसे स्मारक चिह्न प्राप्त हुए हैं जिनसे प्राचीन भारत के इतिहास पर प्रकाश पड़ा है। इन स्मारकों में जावा, कम्बोज, मलाया, स्याम, कोचीन चाइना, वोर्निया, कैम्बे आदि में प्राप्त प्राचीन स्मारक विशेष उल्लेखनीय हैं। जावा में डोंडा पठार का शिव-मन्दिर, मध्य जावा बोरोबोदार एवं ब्रमबनम के देवालयों से यह ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय उपनिवेश-स्थापना में भी पर्याप्त अभिरुचि रखते थे। इसी प्रकार अन्गकोरवात तथा अन्जकोरलाभ में भी प्राचीन स्मारक चिह्न उपलब्ध हुए हैं जिनसे भारतीय औपनिवेशिक प्रसार एवं भारतीयों की कला का बोध होता है। जावा में तुकमस नामक स्थान के भग्नावशेषों में शंख, चक्र, पद्य तथा त्रिशूल आदि का विद्यमान रहना प्रमाणित हुआ है। इससे यह स्पष्टतया ज्ञात होता है कि हिन्दू धर्म जावा तक प्रसारित था और इस धर्म के अनुयायी वहाँ पर्याप्त संख्या में रहते थे। इसी प्रकार मलाया सुन-गेई-वतु में एक देवालय एवं कुछ पाषाण-मूर्तियाँ मिली।
मुद्रायें
→ जो पुरातात्त्विक सामग्रियाँ ऐतिहासिक सूचनायें प्राप्त करने के साधनों में अपना विशेष महत्त्व रखती हैं, मुद्राओं का स्थान इनमें काफी ऊँचा है। इस क्षेत्र में मुद्राओं की महानता के प्रमुख कारण ये हैं कि ये निष्पक्ष हैं, अर्थात् इनमें किसी सम्प्रदाय-विशेष या किसी मत-विशेष का पक्ष लेकर पक्षपातयुक्त तथ्य का सम्पादन नहीं होता। ये पूर्णतया राजकीय होती हैं (केवल जाली सिक्कों को छोड़कर)। इनसे जो कुछ सूचना प्रतिपादित होती है, उस पर काफी विश्वास किया जा सकता है। इनकी दूसरी विशेषता यह है कि ये राजाओं की वंश-परम्परा का बोध कराती हैं। तिथि एवं नामयुक्त मुद्राओं का तो इस क्षेत्र में अत्यधिक महत्त्व है। इनसे हमें इतिहास की उलझी हुई तिथियों का बोध होता है। जिन मुद्राओं में तिथियाँ नहीं भी दी गई हैं, वे भी कम महत्त्व की नहीं, क्योंकि उनकी तकनीक के आधार पर उनके समय का निर्धारण कुछ अन्वेषण के पश्चात् किया जाता है। मुद्राओं की अन्य विशेषता यह है कि इनसे राजाओं के साम्राज्य-विस्तार का कुछ ज्ञान प्राप्त होता है, पर मुद्राओं के प्राप्ति-स्थान के आधार पर साम्राज्य-विस्तार के निर्धारण में काफी सावधानी से काम लेना पड़ता है; क्योंकि केवल मुद्राओं के प्राप्त होने से यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उस स्थान तक अमुक सम्राट् का आधिपत्य है। इनके कुछ अन्य आर्थिक कारण भी हो सकते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि मुद्राओं से देश की राजनैतिक परिस्थिति पर प्रचुर प्रकाश पड़ता है।
→ मुद्रायें राजनैतिक परिस्थिति के अतिरिक्त आर्थिक परिस्थिति पर भी कुछ प्रकाश डालती हैं। उनकी धातुओं के आधार पर हम तत्कालीन आर्थिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं पर यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उत्तम कोटि की धातु की निर्मित मुद्राओं के बाहुल्य का अर्थ है- समाज धन-धान्यपूर्ण था और निम्नकोटि की धातुओं की मुद्राओं से तत्कालीन आर्थिक हीनता का बोध होता है। वास्तव में मुद्राओं में धातुओं की उत्तमता कुछ तो राजकोष की समृद्धि पर आधारित है और कुछ चलाने वाले सम्राट की रूचि एवं परिपाटी पर निर्भर है।
→ मुद्राओं का एक और महत्त्व भी है। ये सम्राट्-विशेष के धर्म तथा उसकी रुचि की ओर भी ध्यान आकृष्ट करती हैं। मुद्राओं पर उत्कीर्ण चिह्नों से हमें ज्ञात होता है कि अमुक राजा, अमुक धर्म का अनुयायी था; पर कुछ ऐसे उदाहरण हैं कि एक ही मुद्रा पर विभिन्न धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण हैं। कनिष्क मुद्राओं को हम इसी कोटि में रख सकते हैं। फिर भी अधिकांश मुद्रायें जिन कोई विशेष धार्मिक चिह्न उत्कीर्ण है, राजाओं के धर्म का ठीक-ठीक बो कराती हैं। राजाओं की रुचि का तो बिलकुल ही ठीक बोध इन मुद्राओं से होता है। यदि मनोवैज्ञानिक आधार पर मुद्राओं के आकार-प्रकार, उन पर उत्कीर्ण पशु-पक्षी एवं अस्त्र-शस्त्र का अध्ययन किया जाए तो उस राजा के वैयक्तिक जीवन का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो सकता है।
→ गुप्त सम्राटों के इतिहास के विभिन्न साधनों में मुद्रायें भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। समुद्रगुप्त की मुद्राओं के आधार पर ही हम यह निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि वह ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। उसकी मुद्राओं पर उत्कीर्ण वीणा के आधार पर ही हम उसे संगीत-कला का प्रेमी घोषित करते हैं।















