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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019: एक अवलोकन (शब्द-2017)
चर्चा का कारण
→ हाल ही में संसद ने ऐतिहासिक उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2019 को अनुमति प्रदान कर दी है, और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के पश्चात अब इसने कानून का रुप ले लिया है। इस अधिनियम का उद्देश्य उपभोक्ताओं के विवादों के शीघ्र और प्रभावी रूप से समाधान करने के लिए एक प्राधिकरण की स्थापना करना है। यह विधेयक तीन दशक से भी पुराने ‘उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 1986’ का स्थान लेगा। केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मामलों के मंत्री ने कहा कि यह अधिनियम उपभोक्ताओं के शिकायत निवारण की प्रक्रिया को सरल बनाएगा, फलस्वरूप उपभोक्ताओं की शिकायतों का तेजी से समाधान होगा और इससे देशभर में उपभोक्ता अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों का निपटारा करने में सहायता मिलेगी।
उपभोक्ता अधिकार
→ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के तेजी से विकास की ओर अग्रसर होने के कारण तकनीकी एवं उच्च विशेषता वाले असहज उत्पादों के निर्माण होने से उपभोक्ताओं में उनके उपभोग के लिए सस्ता एवं अच्छा उत्पाद के चुनाव के लिए व्यापक संशय उत्पन्न हो गया है। आधुनिक व्यापारिक तकनीकों और लुभावने विज्ञापनों पर विश्वास कर लोग वस्तु की खरीद तो करते हैं परन्तु यह उनके उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती है। उपभोक्ताओं के हितों की देखरेख के लिए संगठनों के अभाव होने से यह समस्या और भी जटिल हो जाती है। इसी परिस्थिति को मद्देनजर रखते हुए उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए संस्थागत प्रणाली की शुरूआत विभिन्न देशों में की गई जिन्हें उपभोक्ता अधिकार कहा जाता है।
इतिहास
→ उपभोक्ता अर्थात क्रेता के अधिकारों के संरक्षण की परम्परा समाज के विकास के साथ ही विकसित हुई है। कौटिल्य के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में भी क्रेता के अधिकारों तथा विक्रेता की लोभी प्रवृत्ति का उल्लेख मिलता है। उपभोक्ता के संरक्षण से संबंधित आधुनिक आंदोलन, जिसे उपभोक्ता आंदोलन भी कहा जाता है, की शुरूआत 15 मार्च, 1962 को अमेरिका से हुई। इस दिन अमेरिका के राष्ट्रपति कैनेडी ने उपभोक्ता के अधिकारों को ‘बिल ऑफ राइट्स’ में सम्मिलित करने की घोषणा के साथ-साथ ‘उपभोक्ता सुरक्षा आयोग’ के गठन की घोषणा की थी। इसी उपलक्ष्य में प्रति वर्ष 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।
→ अमेरिका द्वारा की गयी इस पहल से प्रेरित होकर 1973 में ब्रिटेन में भी व्यापार संबंधी अधि नियम लागू किया गया। अमेरिका के बिल ऑफ राइट्स में शामिल उपभोक्ता अधिकार सूचना, सुरक्षा, उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार तथा स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार शामिल कर इसे और सशत्तफ़ बनाया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा उपभोक्ता हितों के संरक्षण के लिए कई दिशा-निर्देश भी जारी किए गए। संयुक्त राष्ट्र संघ के इस प्रयास के बाद अमेरिका, यूरोप तथा विश्व के अन्य विकसित एवं विकासशील देशों में उपभोक्ता के संरक्षण की दिशा में व्यापक रूप से जागरूकता आयी।
→ 1966 में जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कुछ उद्योगपतियों द्वारा उपभोक्ता संरक्षण के तहत फेयर प्रैक्टिस एसोसिएशन की मुंबई में स्थापना की गई और इसकी शाखाएँ कुछ अन्य प्रमुख शहरों में भी स्थापित की गईं और हम यह कह सकते हैं कि यहीं से भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरूआत हुई। इसके बाद स्वयंसेवी संगठन के रूप में ग्राहक पंचायत की स्थापना बी-एम- जोशी द्वारा 1974 में पुणे में की गई। अनेक राज्यों में उपभोक्ता कल्याण हेतु संस्थाओं का गठन हुआ। इस प्रकार उपभोक्ता आन्दोलन आगे बढ़ता रहा।
→ 24 दिसम्बर, 1986 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पहल पर उपभोक्ता संरक्षण विधेयक को संसद ने पारित किया और राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित होने के बाद देशभर में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लागू हुआ। इस अधिनियम में बाद में 1993 व 2002 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। इन व्यापक संशोध नों के बाद यह एक सरल व सुगम अधिनियम हो गया है। इस अधिनियम के अधीन पारित आदेशों का पालन न किए जाने पर धारा 27 के अधीन कारावास व दण्ड तथा धारा 25 के अधीन कुर्की का प्रावधान किया गया है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की मुख्य विशेषताएँ
→ उपभोक्ता की परिभाषाः उपभोक्ता वह व्यक्ति है जो अपने इस्तेमाल के लिए कोई वस्तु खरीदता है या सेवा प्राप्त करता है। इसमें वह व्यक्ति शामिल नहीं है जो दोबारा बेचने के लिए किसी वस्तु को हासिल करता है या कॉमर्शियल उद्देश्य के लिए किसी वस्तु या सेवा को प्राप्त करता है। इसके अंतर्गत इसमें इलेक्ट्रॉनिक तरीके, टेलीशॉपिंग, मल्टी लेवल मार्केटिंग या सीधे खरीद के जरिए किया जाने वाला सभी तरह का ऑफलाइन या ऑनलाइन लेनदेन शामिल है।
→ उपभोक्ताओं के अधिकारः बिल में उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को स्पष्ट किया गया है जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
→ ऐसी वस्तुओं और सेवाओं की मार्केटिंग के खिलाफ सुरक्षा जो जीवन और संपत्ति के लिए जोखिमपरक हैं,
→ वस्तुओं या सेवाओं की गुणवत्ता, मात्रा, शक्ति, शुद्धता, मानक और मूल्य की जानकारी प्राप्त होना,
→ प्रतिस्पर्द्धात्मक मूल्यों पर वस्तु और सेवा उपलब्ध होने का आश्वासन प्राप्त होना,
→ अनुचित या प्रतिबंधित व्यापार की स्थिति में मुआवजे की माँग करना।
→ केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरणः केंद्र सरकार उपभोक्ताओं के अधिकारों को बढ़ावा देने, उनका संरक्षण करने और उन्हें लागू करने के लिए केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) का गठन करेगी। यह प्राधिकरण उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन, अनुचित व्यापार और भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मामलों को विनियमित करेगा। महानिदेशक की अध्यक्षता में CCPA की एक अन्वेषण शाखा (इन्वेस्टिगेशन विंग) होगी, जो ऐसे उल्लंघनों की जांच या इन्वेस्टिगेशन कर सकती है।
CCPA के कार्यः
→ उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन की जाँच और उपयुक्त मंच पर कानूनी कार्यवाही शुरू करना,
→ जोखिमपरक वस्तुओं को रीकॉल या सेवाओं को वापस करने के लिए आदेश जारी करना,चुकाई गई कीमत की भरपाई करना और अनुचित व्यापार को बंद कराना, संबंधित ट्रेडर/ मैन्यूफैक्चरर/ एन्डोर्सर/ एडवरटाइजर /पब्लिशर को झूठे या भ्रामक विज्ञापन को बंद करने या उसे सुधारने का आदेश जारी करना,
→ जुर्माना लगाना
→ खतरनाक और असुरक्षित वस्तुओं और सेवाओं के प्रति उपभोक्ताओं को सेफ्रटी नोटिस जारी करना।
→ उपभोक्ता विवाद निवारण कमीशनः जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर ‘उपभोक्ता विवाद निवारण कमीशनों’ (CDRC) का गठन किया जाएगा। एक उपभोक्ता निम्नलिखित के संबंध में आयोग में शिकायत दर्ज करा सकता हैः
→ अनुचित और प्रतिबंधित तरीके का व्यापार,
→ दोषपूर्ण वस्तु या सेवाएँ,
→ अधिक कीमत वसूलना या गलत तरीके से कीमत वसूलना,
→ ऐसी वस्तुओं या सेवाओं को बिक्री के लिए पेश करना, जो जीवन और सुरक्षा के लिए जोखिमपरक हो सकती हैं। अनुचित कॉन्ट्रैक्ट के खिलाफ शिकायत केवल राज्य और राष्ट्रीय CDRC में फाइल की जा सकती हैं। जिला CDRC के आदेश के खिलाफ राज्य CDRC में सुनवाई की जाएगी। राज्य CDRC के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय CDRC में सुनवाई की जाएगी। अंतिम अपील का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को होगा।
→ CDRC का क्षेत्रधिकारः जिला CDRC उन शिकायतों के मामलों को सुनेगा, जिनमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमत एक करोड़ रुपए से अधिक न हो। राज्य CDRC उन शिकायतों के मामले में सुनवाई करेगा, जिनमें वस्तुओं और सेवाओं की कीमत एक करोड़ रुपए से अधिक हो, लेकिन 10 करोड़ रुपए से अधिक न हो। 10 करोड़ रुपए से अधिक की कीमत की वस्तुओं और सेवाओं से संबंधित शिकायतें राष्ट्रीय CDRC द्वारा सुनी जाएंगी।
→ उत्पाद की जिम्मेदारी (प्रोडक्ट लायबिलिटी): उत्पाद की जिम्मेदारी का अर्थ है, उत्पाद के विनिर्माता, सेवा प्रदाता या विक्रेता की जिम्मेदारी। यह उसकी जिम्मेदारी है कि वह किसी खराब वस्तु या दोषी सेवा के कारण होने वाले नुकसान या चोट के लिए उपभोक्ता को मुआवजा दे। मुआवजे का दावा करने के लिए उपभोक्ता को बिल में स्पष्ट खराबी या दोष से जुड़ी कम से कम एक शर्त को साबित करना होगा।
→ अनुचित कॉन्ट्रैक्टः एक कॉन्ट्रैक्ट अनुचित है, अगर इससे उपभोक्ता के अधिकारों में कोई महत्वपूर्ण नकारात्मक परिवर्तन होता है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:
→ बहुत अधिक सिक्योरिटी डिपॉजिट की मांग,
→ कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने पर ऐसा दंड जो कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने से होने वाले नुकसान के अनुपात में न हो,
→ अगर उपभोक्ता किसी कर्ज का रीपेमेंट पहले करना चाहे तो इसे लेने से इनकार करना,
→ बिना किसी उचित कारण के कॉन्ट्रैक्ट को समाप्त करना,
→ बिना उपभोक्ता की सहमति के कॉन्ट्रैक्ट को थर्ड पार्टी को ट्रांसफर करना, जिससे उपभोक्ता का नुकसान होता हो,
→ ऐसा अनुचित शुल्क या बाध्यता लगाना, जिससे उपभोक्ता का हित प्रभावित होता हो। राज्य एवं राष्ट्रीय आयोग निर्धारित कर सकते हैं कि कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें अनुचित हैं और ऐसी शर्तों को अमान्य घोषित कर सकते हैं।
दंड एवं उपचार का प्रावधान
→ अगर कोई व्यक्ति जिला, राज्य या राष्ट्रीय आयोगों के आदेशों का पालन नहीं करता तो उसे कम से कम एक महीने और अधिकतम तीन वर्ष तक के कारावास की सजा हो सकती है या उस पर कम से कम 25,000 रुपए का जुर्माना लगाया जा सकता है जिसे एक लाख रुपए तक बढ़ाया जा सकता है या उसे दोनों सजा भुगतनी पड़ सकती है।
→ झूठे और भ्रामक विज्ञापनों के लिए मैन्यूफैक्चरर या एंडोर्सर पर 10 लाख रुपए तक का दंड लगाया जा सकता है और अधिकतम दो वर्षों का कारावास भी हो सकता है। इसके बाद अपराध करने पर यह जुर्माना बढ़कर 50 लाख रुपए तक हो सकता है और सजा पाँच वर्षों तक बढ़ाई जा सकती है। दोषी को दण्ड और जुर्माने दोनों से दण्डित भी किया जा सकता है।
→ CCPA भ्रामक विज्ञापन के एंडोर्सर को एक वर्ष तक की अवधि के लिए किसी विशेष उत्पाद या सेवा को एंडोर्स करने से प्रतिबंधित भी कर सकती है। हर बार अपराध करने पर प्रतिबंध की अवधि तीन वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। ऐसे कुछ अपवाद भी हैं जब एंडोर्सर को ऐसे किसी दंड के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
→ CCPA मिलावटी उत्पादों की मैन्यूफैक्चरिंग, बिक्री, स्टोरिंग, वितरण या आयात के लिए भी दंड लगा सकती है। ये दंड निम्नलिखित हैं:
→ अगर उपभोक्ता को क्षति नहीं हुई है तो दंड एक लाख रुपए तक का जुर्माना और छह महीने तक का कारावास हो सकता है,
→ अगर क्षति पहुँची है तो दंड तीन लाख रुपए तक का जुर्माना और एक वर्ष तक का कारावास हो सकता है,
→ अगर गंभीर चोट लगी है तो दंड पाँच लाख रुपए तक का जुर्माना और सात वर्ष तक का कारावास हो सकता है,
→ मृत्यु की स्थिति में दंड दस लाख रुपए या उससे अधिक का जुर्माना और कम से कम सात वर्ष का कारावास हो सकता है जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
→ CCPA नकली वस्तुओं की मैन्यूफैक्चरिंग, बिक्री, स्टोरिंग, वितरण या आयात के लिए भी दंड लगा सकती है। ये दंड निम्नलिखित हैं:
→ अगर क्षति पहुँची है तो दंड तीन लाख रुपए तक का जुर्माना और एक वर्ष तक का कारावास हो सकता है,
→ अगर गंभीर चोट लगी है तो दंड पाँच लाख तक का जुर्माना और सात वर्ष तक का कारावास हो सकता है,
→ मृत्यु की स्थिति में दंड दस लाख रुपए या उससे अधिक का जुर्माना और कम से कम सात वर्ष का कारावास हो सकता है जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है।
उपभोक्ता संरक्षण परिषदों की संरचना और भूमिका
→ उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 परामर्श निकाय के तौर पर जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर उपभोक्ता संरक्षण परिषदों (CPC) को स्थापित करता है। ये परिषदें उपभोक्ता अधिकारों को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण के संबंध में परामर्श देंगी। इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्रीय परिषद और राज्य परिषद का नेतृत्व क्रमशः केंद्र और राज्य स्तर के उपभोक्ता मामलों के मंत्री द्वारा किया जाएगा। जिला परिषद का नेतृत्व जिला कलेक्टर द्वारा किया जाएगा।
→ इसके अनुसार, इन निकायों को उपभोक्ता अधिकारों को बढ़ावा देने और उनके संरक्षण के संबंध में परामर्श देना चाहिए।
निष्कर्ष
→ उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 को संसद द्वारा पारित कर दिया गया है जिससे उपभोक्ताओं के संरक्षण की उम्मीद तेज हो गई है। इस विधेयक में परिवर्तन को लेकर काफी पहले से बहस चल रही थी जो अब जाकर पूर्ण हुई है। अब यह अधिनियम नागरिकों के हितों के संरक्षण में अपना सहयोग देगा।
→ इसके तहत उपभोक्ताओं के शिकायतों की त्वरित गति से सुनवाई होगी जो सरकार की गुड गवर्नेंस के लक्ष्यों को आगे बढ़ाएगा। इससे खराब गुणवत्ता वाले सामानों का मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों से भी मुक्ति मिलेगी क्योंकि यह कानून उन पर रोक लगाएगा।
→ हालांकि एक सच्चाई यह भी है कि सिर्फ कानून बना देने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो जाता बल्कि आवश्यकता है उस कानून को सही तरीके से लागू करने की, ताकि इसका फायदा देश के हर नागरिक को मिल सके। साथ ही उपभोक्ताओं को जागरूक करने की भी आवश्यकता है ताकि वे इस कानून को जान व समझ सकें और अधिकारों के लिए उपभोक्ता फोरम तक पहुँच सकें। इससे सरकार के स्वस्थ नागरिक व स्वस्थ देश की अवधारणा को साकार किया जा सकता है।














