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। Essay-03।

राज्य से केन्द्रशासित प्रदेश की ओर: जम्मू कश्मीर के विशेष संदर्भ में (शब्द-2405)
चर्चा का कारण
→ संसद के दोनों सदनों में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, 2019 पास होने के बाद जिसपर राष्ट्रपति ने अपना हस्ताक्षर कर दिए हैं, इसके परिणामस्वरूप अब जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बाँट दिया गया है। सरकार ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाए जाने का कारण सुरक्षा और सामरिक आधार पर उसकी विशेष स्थिति को बताया है। अब देश में 7 की जगह 9 केंद्रशासित प्रदेश हो गए हैं। इस लेख में हम जानेंगे कि भारत में जो 9 केंद्रशासित प्रदेश बनाए गए हैं, उनके क्या कारण हैं?
परिचय
→ संघ राज्य क्षेत्रः मूल संविधान के अंतर्गत भारत में चार प्रकार के राज्यों यथा-A, B, C तथा D का गठन किया गया था। 1953 में न्यायमूर्ति फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया जिसकी रिपोर्ट के आधार पर 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के उद्देश्य से 7वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 पारित किया गया। इस संशोधन द्वारा राज्यों के उक्त चार वर्गों को समाप्त कर दिया गया तथा उन्हें दो वर्गों-(1) राज्य (State), (2) संघ राज्य (The Union Territories) में रखा गया। वर्तमान में भारतीय संघ के तहत कुल 28 राज्य तथा 9 संघ राज्य क्षेत्र हो गए हैं।
→ संघ राज्य क्षेत्रों का उल्लेख संविधान के भाग-8 में अनुच्छेद 239-242 के अन्तर्गत किया गया है। इसमें अनुच्छेद 239 संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासन के बारे में है। संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। इसके लिए राष्ट्रपति अपने अभिकर्त्ता के रूप में एक प्रशासक (Administrator) की नियुक्ति करता है, जो राष्ट्रपति द्वारा विशेष (Specified) पदनाम (designations) से जाना जाता है। विभिन्न संघ शासित राज्यों के प्रशासकों के पदनाम भिन्न-भिन्न हैं। जैसे- दिल्ली, पुदुचेरी और अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के प्रशासक को उपराज्यपाल (Lieutenant Governor), चण्डीगढ़ के प्रशासक को मुख्य आयुक्त (Chief Commissioner) कहा जाता है। शेष संघ राज्यों में प्रशासक होते हैं। उल्लेखनीय है कि पंजाब राज्य का राज्यपाल ही चण्डीगढ़ का प्रशासक होता है। दादर और नागर हवेली का प्रशासक दमन एवं दीव का भी कार्य देखता है, वहीं लक्षद्वीप का अलग प्रशासक होता है।
केंद्रशासित प्रदेश के गठन के कारण
→ केंद्रशासित प्रदेश या संघ-राज्यक्षेत्र या संघक्षेत्र भारत के संघीय प्रशासनिक ढांचे की एक इकाई हैं। भारत में केंद्रशासित प्रदेश क्यों बनाए गए इसके पीछे की वजह भी ख़ास है जैसे, छोटा आकार और कम जनसंख्या, अलग संस्कृति, अन्य राज्यों से दूरी, प्रशासनिक महत्व, स्थानीय संस्कृतियों की सुरक्षा करना, शासन के मामलों से संबंधित राजनीतिक उथल-पुथल को दूर करना और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थिति आदि। जिन्हें निम्न बिन्दुओं के माध्यम से समझ सकते हैं-
→ प्रशासनिक ढाँचाः भारत के राज्यों की अपनी चुनी हुई सरकारें होती हैं, लेकिन केंद्रशासित प्रदेशों में सीधे-सीधे भारत सरकार का शासन होता है। भारत के राष्ट्रपति हर केंद्रशासित प्रदेश का एक ‘सरकारी प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर)’ या ‘उप-राज्यपाल (लेफ्रिटनेंट गवर्नर)’ नामित करते हैं। केंद्रशासित प्रदेशों का शासन राष्ट्रपति इन्हीं प्रशासक या उप-राज्यपाल के जरिए करते हैं। भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति कोई भी काम केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही करते हैं, इसलिए इसका सीधा अर्थ यही हुआ कि केंद्रशासित प्रदेश पर केंद्र सरकार का ही शासन चलता है।
→ केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा और मंत्रिपरिषद हो भी सकते हैं और नहीं भी। लेकिन इन दोनों के अधिकार बहुत सीमित होते हैं और कुछ ही मामले में इनको अधिकार होते हैं। इन विधानसभाओं के जरिए पारित विधेयक को भी राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी पड़ती है और कुछ ख़ास कानून बनाने के लिए तो इन्हें केंद्र सरकार से अग्रिम स्वीकृति लेनी पड़ती है अतः कुछ विशेष परिस्थितियों के कारण इन क्षेत्र को किसी राज्य का हिस्सा नहीं बनाकर सीधे केंद्र सरकार के अधीन रखा जाता है।
→ भौगोलिक कारणः ये कानूनी तौर पर तो भारत का हिस्सा होते हैं लेकिन प्रायः भारत के मुख्य भूभाग (Main Land) से बहुत दूर होते हैं, इसलिए किसी पड़ोसी राज्य का हिस्सा नहीं बन सकते और जनसंख्या एवं क्षेत्रफल के हिसाब से इतने छोटे होते हैं कि उन्हें अलग राज्य का दर्जा देना मुश्किल होता है। इसलिए उन्हें केंद्रशासित प्रदेश बना दिया जाता है। अंडमान निकोबार और लक्षद्वीप इसके उदाहरण हैं।
→ लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह हमारे देश के बहुत दूर पश्चिम और पूर्व छोर पर स्थित हैं और वे मुख्य क्षेत्र से काफी दूर हैं, इसलिए केंद्र सरकार के जरिए उन्हें सीधे नियंत्रित करना आसान होता है क्योंकि वे भारत के लिए रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं और किसी भी आपातकालीन स्थिति में भारत सरकार सीधे वहाँ कार्यवाही कर सकती है। इसी प्रकार भारत में सभी केंद्रशासित प्रदेशों का आकार इतना बड़ा नहीं है कि उन्हें एक पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सके। दिल्ली के अलावा अन्य केंद्रशासित प्रदेशों में बहुत कम आबादी है और एक राज्य की तुलना में इन संघ राज्यों का क्षेत्रफल भी बहुत कम है, इसलिए विधानसभा का गठन और उसके लिए मंत्रिपरिषद बनाने से सरकारी खजाने पर अतिरित्तफ़ बोझ पड़ सकता है।
→ सांस्कृतिक कारणः सांस्कृतिक कारणों से भी केंद्रशासित प्रदेशों का गठन किया जाता है। कई बार किसी जगह की ख़ास सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए उन्हें केंद्रशासित प्रदेश बना दिया जाता है, उदाहरणस्वरूप दमन व दीव, दादर व नागर हवेली और पुदुचेरी।
→ दरअसल यहाँ लंबे समय तक यूरोपीय देशों पुर्तगाल (दमन व दीव, दादर व नागर हवेली) और फ्रांस (पुदुचेरी) का राज रहा था। इसलिए यहाँ की संस्कृति उनसे मेल खाती है और इसलिए इनकी सांस्कृतिक विविधता बनाए रखने के लिए इन्हें किसी राज्य के साथ ना मिलाकर केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दे दिया गया। पुदुचेरी की एक और ख़ास बात ये है कि इसके चार जिले अलग-अलग राज्यों से मिलते हैं। माहे केरल के पास, यनम आंध्र प्रदेश के पास और पुदुचेरी व कराईकल तमिलनाडु के पास स्थित हैं। ऐसे में सबसे बेहतर यही था कि उन्हें एक केंद्रशासित प्रदेश बनाकर रखा जाए।
→ राजनैतिक कारणः राजनैतिक और प्रशासनिक कारणों से भी केंद्रशासित प्रदेश बनाये जाते हैं। दिल्ली और चंडीगढ़ इसके उदाहरण हैं। भारत में नई दिल्ली को किसी राज्य से अलग उसी प्रकार रखा गया है, जैसे- संयुक्त राज्य अमरीका में राजधानी वाशिंगटन डीसी को रखा गया है। 1956 से 1991 तक नई दिल्ली भी केंद्रशासित प्रदेश ही था लेकिन 1991 में 69वें संविधान संशोधन से राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश (NCT) का दर्जा प्राप्त हुआ है और दिल्ली में भी पुदुचेरी की तरह मंत्रिमंडल व मुख्यमंत्री की व्यवस्था है। यहाँ भी उपराज्यपाल की नियुक्ति होती है जो केंद्र सरकार करती है और उपराज्यपाल व मंत्रिमंडल के सामंजस्य से यह प्रदेश चलता है।
संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन
→ राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल को किसी निकटवर्ती संघ राज्य क्षेत्र का प्रशासक नियुक्त कर सकता है और जहाँ कोई राज्यपाल इस प्रकार प्रशासक नियुक्त किया जाता है, वहाँ वह ऐसे प्रशासक के रूप में अपने कृत्यों का प्रयोग मंत्रिपरिषद् से स्वतंत्र रूप में करता है (अनुच्छेद 239)।
→ राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रशासक, संघ राज्य क्षेत्रों का प्रशासन संसद द्वारा निर्मित विधि के अनुसार या विधान सभा द्वारा निर्मित विधि के अनुसार (जिन संघ राज्यों में विधान सभा है) चलाता है। ध्यातव्य है कि जिन संघ राज्यों की अपनी विधान सभा नहीं है, उसके लिए विधि का निर्माण संसद करती है।
→ संघ राज्य क्षेत्रों के लिए मूल संविधान में विधान सभा तथा मंत्रिपरिषद् के लिए प्रावधान नहीं किया गया था, किन्तु संसद को अनुच्छेद-239 के तहत यह शक्ति प्रदान की गयी थी कि वह संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विधि द्वारा कोई अन्य प्रावधान कर सकती है। 14वें संविधान संशोधन अधिनियम (1962) द्वारा संविधान में अनुच्छेद ‘239(क)’ जोड़कर यह प्रावधान किया गया है कि संसद कुछ संघ राज्य क्षेत्रों के लिए विधानमण्डल या मंत्रिपरिषद् या दोनों का सृजन कर सकती है।
→ 1963 में संसद ने एक संसदीय विधि (Parliamentary Law) द्वारा पुदुचेरी में 30 सदस्यीय विधान सभा गठित कर दी।
भारत के केन्द्र शासित प्रदेश
→ जम्मू-कश्मीरः जम्मू-कश्मीर को सुरक्षा और सामरिक आधार पर विशेष स्थिति के कारण केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया है। इसमें दिल्ली की तरह मंत्रिमंडल व मुख्यमंत्री की व्यवस्था रहेगी।
→ लद्दाख: लद्दाख की सीमा रेखा चीन से मिलती है। इसलिए यह भी सुरक्षा और सामरिक आधार पर विशेष स्थान रखता है। यही वजह है कि लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया है। लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा का प्रावधान नहीं है।
→ दिल्लीः देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। 1956 से 1991 तक नई दिल्ली केंद्रशासित प्रदेश ही था। 1991 में इसे राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। यहां पुदुचेरी की तरह मंत्रिमंडल व मुख्यमंत्री की व्यवस्था है।
→ पुदुचेरीः 1 नवम्बर, 1956 को पुदुचेरी केंद्रशासित प्रदेश बना। यह पहले फ्रांस का उपनिवेश था। सांस्कृतिक विविधता बनाए रखने के लिए पुदुचेरी को किसी राज्य में नहीं मिलाया गया। पुदुचेरी का विस्तार चार अलग-अलग जगहों पर है जिनके नाम माहे, यनम, कराईकल और पुडुचेरी हैं।
→ लक्षद्वीपः लक्षद्वीप भी 1 नवम्बर, 1956 को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। यह भी भारत की मुख्य भूमि से बहुत दूर था इसलिए इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा मिला।
→ अंडमान और निकोबार द्वीप समूहः अंडमान और निकोबार द्वीप समूह 1 नवम्बर, 1956 को केंद्रशासित प्रदेश बना। भारत की मुख्य भूमि से बहुत दूर होने के कारण इसे केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया।
→ अंडमान निकोबार द्वीप समूह और लक्षद्वीप भारत की सुरक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों के संघीय राज्य होने के दो कारण हैं-
(1). वे किसी भी राज्य में विलय किए जाने के लिए बहुत दूर हैं।
(2). उनकी संस्कृति पूरी तरह अलग है इसलिए उन्हें किसी भी राज्य के साथ विलीन करना प्रशासनिक दृष्टि से ठीक नहीं है। अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर जारवा जनजाति रहती है जो अभी भी आदिम जिंदगी जी रही है और उनकी संस्कृति से छेड़छाड़ करना भारत सरकार द्वारा अपराध घोषित किया गया है।
→ दादर और नागर हवेलीः दादर और नागर हवेली 11 अगस्त, 1961 को केंद्रशासित प्रदेश बना। दादर और नागर हवेली पुर्तगाल का उपनिवेश था। सांस्कृतिक विविधता बनाए रखने के लिए दादर और नागर हवेली को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया।
→ दमन-दीवः दमन और दीव को 30 मई, 1987 को केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया। दमन और दीव भी पुर्तगाल का उपनिवेश था। सांस्कृतिक विविधता बनाए रखने के लिए ही इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया है।
→ चंडीगढ़ः 1 नवंबर, 1966 को हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया। चंडीगढ़ पहले पंजाब का एक हिस्सा था। बाद में पंजाब को विभाजित किया गया और 1 नवंबर 1966 को हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया लेकिन चंडीगढ़ के प्रशासनिक महत्व के कारण कोई भी राज्य इसे छोड़ने को तैयार नहीं था। यही वजह थी कि चंडीगढ़ को दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी बनाया गया था।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
→ नया राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश बनाने से पहले उन राज्यों की स्थिति का जायजा लिया जाना चाहिए, जो बड़े-बड़े दावों के आधार पर बनाए गए थे। यह आकलन का विषय है कि मूल प्रदेश से अलग होने के बाद लद्दाख क्या उन राज्यों में शामिल होगा जहाँ क्रांतिकारी बदलाव आए? निर्माण के दशकों बाद भी जम्मू-कश्मीर विकास की बाट जोह रहा है। आंकड़ों के आधार पर यह दावा किया जा सकता है कि यूपी से अलग होने के बाद उत्तराखंड की प्रति व्यत्तिफ़ आय दोगुनी हो गई। आँकड़े जो चाहे कहें, मगर इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस कागजी समृद्धि के पीछे राज्य के विकास की जगह बंटवारे के बाद जनसंख्या में आई औसत कमी का योगदान अधिक है। इन राज्यों की जमीनी हालात में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है।
→ इन राज्यों की सरकारों ने न तो सिस्टम में क्रांतिकारी परिवर्तन किया और न ही ऐसी योजनाएं बनायी हैं, जिनसे प्रदेश की जनता की स्थिति में सुधार हो सके। आज भी छत्तीसगढ़ और झारखंड में नक्सली हमले जारी हैं। वहाँ के निवासियों को उन दिक्कतों से निजात नहीं मिली है, जो 2000 से पहले वहाँ थीं। वहाँ आज भी लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क बिजली, पानी जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। चाहे पंजाब से अलग हुआ हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश से हुआ उत्तराखंड, ये राज्य आर्थिक मदद के लिए हमेशा दिल्ली की ओर टकटकी लगाए रखते हैं।
→ सीमावर्ती राज्यों में रह रहे लोग भाषा के आधार पर, विकास के आधार पर अथवा दूरी के आधार पर भारत के कितने नजदीक हैं, यह भी सोचना होगा। क्योंकि भारत के सीमावर्ती और पूर्वोत्तर राज्य देश के विकास और आंतरिक सुरक्षा के लिए काफी महत्वपूर्ण है, इसलिए भारत के नीति-निर्माताओं को सर्वप्रथम इन राज्यों की समस्याओं को दूर करना होगा। वहाँ के लोगों के बीच अपने लिए सहानुभूति हासिल करनी होगी और उनमें यह विश्वास पैदा करना होगा कि सही मायने में भारत ही उनका हितैषी है। तभी नए राज्यों के गठन की प्रासंगिकता भी है अन्यथा छोटे-छोटे राज्य शत्रु देशों के हाथों का कब खिलौना बन जाएंगे, पता भी नहीं चलेगा।
→ जहाँ तक राजनीतिक स्थिरता की बात है तो नवगठित राज्यों में वह कभी देखने को नहीं मिली। चाहे उत्तराखंड रहा हो या झारखंड। सत्ता का संघर्ष हमेशा विकास पर हावी रहा। पूर्वोत्तर के राज्यों अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नागालैंड, गोवा में तो राजनीतिक स्थिरता की बात करना भी बेमानी है। वहाँ पलक झपकते ही सरकारें बदल जाती हैं। नेताओं की निष्ठा दम तोड़ देती हैं और इसका दुष्प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर और वहाँ के विकास पर पड़ता है। विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त धनराशि और उसके खर्च की जिम्मेदारी लेने के प्रति कोई गंभीर नहीं हो पाता। अगर यह कहा जाए कि पूर्वोत्तर में छोटे राज्यों के गठन का फॉर्मूला सर्वथा विफल हो गया है तो कदाचित गलत नहीं होगा।
आगे की राह
→ भारत सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के खण्ड 1 के सिवाए अन्य उपबंधों को हटाने और राज्य को दो हिस्सों में बांटने का फैसला किया है। केंद्र सरकार के इस फैसले को लेह-लद्दाख में ऐतिहासिक माना जा रहा है। नेता और धार्मिक संस्थाएँ भी इसका स्वागत कर रही हैं। दरअसल लद्दाख में बहुत सालों से इसकी माँग की जा रही थी। साल 1989 में अलग राज्य बनाए जाने को लेकर यहां आंदोलन भी चला था जिसके आधार पर लद्दाख को स्वायत्त हिल डेवलपमेंट काउंसिल मिली थी।
→ अब तक जम्मू और कश्मीर की ही बात होती है जबकि राज्य के क्षेत्रफल का 68 प्रतिशत हिस्सा लद्दाख का है।
→ केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को एक अलग पहचान मिलेगी। हालाँकि कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वहाँ के लोगों को विश्वास में लिए बगैर केंद्र सरकार ने यह कदम उठाया है, जो भारत के संविधान के आत्मा के विरुद्ध है। परंतु आंतरिक सुरक्षा और पड़ोसी देशों से संबंध मजबूत करने हेतु सरकार के द्वारा उठाया गया यह कदम एक सराहनीय प्रयास है। इसके लिए आवश्यकता है कि सरकार वहाँ के नागरिकों के हितों को ध्यान में रखते हुए और उनमें विश्वास बहाली करने के लिए आधारभूत संरचना जैसे कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य इत्यादि क्षेत्रों में ध्यान केन्द्रित करें ताकि जिस उद्देश्य के तहत भारत सरकार द्वारा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 2019 बनाया है, उसकी सार्थकता सिद्ध हो सके।














