GS-Paper 2020 Current Topic Essay-05

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Essay-05


हांगकांग पर चीन का बढ़ता हस्तक्षेप (शब्द-2356)


चर्चा का कारण

  हाल ही में हांगकांग में हिसंक विरोध प्रदर्शन की स्थिति देखी गई। प्रदर्शनकारी हांगकांग सरकार के प्रत्यर्पण विधेयक का विरोध कर रहे हैं। इस नए प्रत्यर्पण विधेयक का विरोध करने वालों में कानूनविद्, कारोबारी, मानव अधिकार कार्यकर्ताओं समेत कई आम लोग भी शामिल है जिनके लिए हांगकांग में कानून का शासन सबसे अहम हैं।


क्या है प्रत्यर्पण विधेयक

  इस कानून के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति चीन में अपराध करके हांगकांग में शरण लेता है तो उसे जाँच प्रक्रिया में शामिल होने के लिए वापस चीन भेज दिया जाएगा। हांगकांग सरकार इस मौजूदा कानून में संशोधन के लिए फरवरी में प्रस्ताव लाई थी।

  इसके अतिरिक्त अगर ये कानून पास हो जाता है तो इससे चीन को उन क्षेत्रों में संदिग्धों को प्रत्यर्पित करने की अनुमति मिल जाएगी, जिनके साथ हांगकांग का समझौता नहीं है। विदित हो कि हांगकांग के मौजूदा प्रत्यर्पण कानून में कई देशों के साथ इसके समझौते नहीं हैं। इसके चलते अगर कोई व्यक्ति अपराध कर हांगकांग वापस जाता है तो उसे मामले की सुनवाई के लिए ऐसे देश में प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता जिसके साथ इसकी संधि नहीं हुई है। चीन को भी अब तक प्रत्यर्पण संधि से बाहर रखा गया था।


विवाद का कारण

  साल 1997 में जब हांगकांग को चीन के हवाले किया गया था तब बीजिंग ने एक देश-दो व्यवस्थाकी अवधारणा के तहत कम से कम 2047 तक लोगों की स्वतंत्रता और अपनी कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने की गारंटी दी थी। इसके चलते हांगकांग और चीन के बीच कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं हुई। लेकिन नए प्रत्यर्पण विधयेक ने स्वतंत्रता और अपनी कानूनी व्यवस्था के प्रति लोगों की चिंताओं को बढ़ा दिया है।

  विधेयक का विरोध करने वाले चीन और हांगकांग को अलग मानते हैं। उनका कहना है कि प्रत्यर्पण विधेयक में किए गए संशोधन हांगकांग की स्वायत्तता को प्रभावित करेंगे।

  गौरतलब है कि हांगकांग में अभी लोकतांत्रिक रूप से सरकार विरोधी प्रदर्शन करने और किसी विचार या मत से असहमति रखने की स्वतंत्रता है, जिसे चीनी सरकार अपनी वैचारिक दर्शन के अनुरूप खत्म करना चाहती है।

  प्रदर्शनकारियों के अनुसार, प्रत्यर्पण संशोधन उन्हें चीन की दलदली न्यायिक व्यवस्था में धकेल देगा, जहां राजनीतिक और वैचारिक विरोधियों को आर्थिक अपराधों और राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों जैसे मामलों में आरोपी बनाकर उनका भीषण शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है। उनकी आशंका है कि इस कानून का उपयोग अभियोजन के लिए हांगकांग से असंतुष्टों या बागियों को चीन भेजा जाएगा। वे मानते हैं कि चीन में एक बार कोई आरोप लगा तो व्यक्ति को ऐसी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है जहाँ अधि कांश आपराधिक मामले यातानाओं के साथ कठोरतम सजा पर समाप्त होते हैं।

  अधिनायकवादी चीन विश्व का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ का राजनीतिक अधिष्ठान साम्यवादी है लेकिन वह पूंजीवाद पर सर्वाधिक बल देता है, जिसमें ही कोई मानवाधिकार है और ही मानवता का कोई स्थान है। परिणामस्वरूप, आज 142 करोड़ की आबादी वाले चीन में मौत की सजा, आत्महत्या करने वालों और अवसाद पीडि़त रोगियों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है।

  वर्ष 2012-13 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सत्ता में आने और गत वर्ष अनिश्चितकाल के लिए राष्ट्रपति रहने की घोषणा के बाद यह स्थिति और भी अधिक विकराल हो गई है। जिनपिंग सरकार के निर्देश पर ही वर्ष 2015 में हांगकांग के कई पुस्तक विक्रेताओं को नजरबंद कर दिया गया था।

  विवाद का एक बिन्दु यह भी माना जा रहा है कि स्थानीय सरकार कानून में यह संशोधन चीनी सरकार के कहने पर कर रही है। दरअसल हांगकांग में कानूनविदों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का एक ऐसा बड़ा वर्ग मौजूद है, जो चीनी सरकार के तानाशाही रवैये का विरोध करता रहा है। जिसके चलते चीन की सरकार अपने मनचाहे आदेश हांगकांग पर थोपने में कामयाब नहीं रही है। प्रस्तुत विधेयक से चीन की सरकार हांगकांग के लोगों को अपनी पक्षपातपूर्ण न्यायिक व्यवस्था के जरिए निशाना बना सकती है।

  उल्लेखनीय है कि इसी साल मार्च में 2014 के अंब्रेला आंदोलन के लिए चार लोगों को सजा सुनाई गई। प्रदर्शन में शामिल नौ लोगों पर महीनों तक चले ट्रायल के बाद ये सजा सुनाई गई। वहीं आजादी का समर्थन करने वाली एक पार्टी पर प्रतिंबध लगा दिया गया था। इस कार्रवाई को चीन की साम्यवादी सरकार का हांगकांग की स्वायत्तता पर बढ़ते दबाव के तौर पर देखा जा रहा है।

  बीजिंग ने हाल के वर्षों में हांगकांग के शहर में अपने प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश की है, जिससे शहर के लोकतंत्र समर्थक समूहों की चिंता बढ़ गई है जो बड़े पैमाने पर बीजिंग को संशय की दृष्टि से देखते हैं। इसके अलावा, हांगकांग में हाल के वर्षों में चीन की बढ़ती अधिनायकवादी प्रवृत्ति को भी देखा जा रहा है। उदाहरण के लिए सांसदों को अयोग्य घोषित किए जाने के कई मामले सामने आए हैं, कार्यकर्ताओं द्वारा कार्यालय चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, एक राजनीतिक दल प्रतिबंधित है और एक विदेशी पत्रकार को निष्कासित कर दिया गया है।


वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  प्रस्तुत विधेयक के संदर्भ में चीन का कहना है कि यदि ये संशोधन जल्द से जल्द पारित नहीं होता हैं तो हांगकांग के लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और शहर अपराधियों का अड्डा बन जाएगा।

  सरकार का कहना है कि नया कानून गंभीर अपराध करने वालों पर लागू होगा, जिसके तहत कम से कम सात साल की सजा का प्रावधान है।

  प्रत्यर्पण की कार्रवाई करने से पहले यह भी देखा जाएगा कि हांगकांग और चीन दोनों के कानूनों में अपराध की व्याख्या है या नहीं। सरकार ने जोर देकर यह भी कहा है कि वह राजनीतिक अपराधों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाएगी।

  इसके अलावा अधिकारियों का यह भी कहना है कि बोलने और प्रदर्शन करने की आजादी से जुड़े मामलों में प्रत्यर्पण की प्रक्रिया नहीं अपनाई जाएगी।

  चीन के रक्षा मंत्रलय ने इस मामले में कहा है कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) हांगकांग सरकार द्वारा अनुरोध करने पर सामाजिक व्यवस्था बनाए रखनेमें मदद कर सकती है।


हांगकांग के बारे में

  हांगकांग लगभग 200 छोटे-बड़े द्वीपों का समूह है और इसका शाब्दिक अर्थ है सुगंधित बंदरगाह। ब्रिटेन ने चीन के साथ व्यापार करने में हांगकांग को एक व्यावसायिक बंदरगाह की तरह इस्तेमाल किया। वर्ष 1941 के बाद लगभग चार वर्ष तक इस पर जापान का अधिकार रहा, किन्तु 1945 में ब्रिटेन और चीनी सेना ने मिलकर जापान को हरा दिया।

  ब्रिटेन ने 1997 में हांगकांग की संप्रभुता कई शर्तों के साथ चीन को वापस सौंपी, जिसमें प्रमुख शर्त थी हांगकांग की पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखना। चीन ने भी रक्षा विदेश छोड़कर हांगकांग की प्रशासकीय व्यवस्था में हस्तक्षेप करने का पूँजीवादी व्यवस्था को आगामी 50 वर्षों तक जस का तस रखने का आश्वासन दिया।

  वर्तमान समय में देखें तो हांगकांग की प्रशासनिक व्यवस्था एक देश, दो नीति के अंतर्गत और बुनियादी कानून के अनुसार संचालित होती है। लेकिन अब चीन अलग राह चुनता दिखाई दे रहा है जिसमें वह हांगकांग पर अधिक प्रभुत्व स्थापित करना चाह रहा है।

  संयुक्त राज्य अमेरिका (यू.एस.) पहले से ही चीन के साथ व्यापार युद्ध में लगा हुआ है। अमरीका ने प्रदर्शनकारियों के समर्थन में कहा कि हांगकांग के लोग लोकतंत्र की माँग कर रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से कुछ सरकारें लोकतंत्र नहीं चाहती हैं। इस पर चीन ने कहा है कि इसके समग्र विकास के लिए मुश्किलें पैदा करने में बड़े पैमाने पर प्रदर्शनों के पीछे अमेरिका का हाथ रहा है।

  इसी तरह यूरोपीय संघ ने भी वर्तमान हांगकांग की स्थिति पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ब्रिटेन ने तो कहा है कि वह हर तरह की हिंसा का विरोध करता है लेकिन प्रशासन को भी समस्या की जड़ को समझना चाहिए। हांगकांग के लोग इस बात से चिंतित हैं कि उनकी आजादी पर हमला हो रहा है। ताइवान ने तो साफ हिदायत देते हुए कहा है कि हांगकांग के लोग गुस्से और निराशा से भर रहे हैं और एक देश दो सिस्टम का आइडिया झूठ के सिवाय कुछ नहीं है। जहां तक भारत का प्रश्न है तो उसने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। हालांकि विश्व के बड़े लोकतंत्र होने के नाते उसने हांगकांग की जनभावना का समर्थन करते हुए शंतिपूर्ण समाधान की मंशा जताई है।


हांगकांग-चीन सम्बन्ध और लोकतंत्र

  हांगकांग ब्रिटेन का एक उपनिवेश था। 1984 में ब्रिटेन और हांगकांग के बीच एक समझौता हुआ था, जिसके तहत हांगकांग को चीन को लौटा दिया गया। इसके लिए हांगकांग में एक देश-दो सरकार का सिद्धांत लागू किया गया। जिसके तहत अगले 50 साल के लिए अपनी स्वतंत्रता, सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक व्यवस्था बनाने की गारंटी दी गई थी।

  इसी के चलते हांगकांग में रहने वाले लोग खुद को चीन का हिस्सा नहीं मानते और खुले आम सरकार की आलोचना करते हैं। इसके बावजूद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने वर्तमान समय में हांगकांग सरकार पर प्रभाव डाला है। विदित हो कि हांगकांग के लोग चीन के के प्रभाव में अपना नेता नहीं चुनते हैं क्योंकि हांगकांग की संसद में चीन समर्थक सांसदों का एक बड़ा गुट है।

  हांगकांग का शासन 1200 सदस्यों की चुनाव समिति के मुख्य कार्यकारी अधिकारी द्वारा चलाया जाता है। हांगकांग के लोग चाहते हैं कि ये प्रतिनिधि जनता के जरिए चुने जाने चाहिए। 2007 में यह निर्णय लिया गया कि 2017 में होने वाले चुनावों में लोगों को मताधि कार का प्रयोग करने का हक मिलेगा। 2014 की शुरूआत में इसके लिए कानूनों में जरूरी बदलाव शुरू हुए।

  इसी क्रम में जनवरी 2013 में हांगकांग की एक प्रोफेसर बेनी ताई ने एक आर्टिकल लिखा, जिसमें कहा गया कि सरकार मताधिकार के अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन नहीं कर रही है। इसके लिए उन्होंने एक अंहिसक आंदोलन करने का वान किया। आंदोलन के लिए ऑक्यूपाई सेंट्रल विद लव एंड पीसनाम का एक संगठन बनाया गया। जून 2014 में इस संगठन ने एक जनमत संग्रह भी कराया, जिसमें करीब आठ लाख लोगों ने वोट दिया। ये हांगकांग के कुल वोटरों का 20 प्रतिशत है।

  31 अगस्त, 2014 को सरकार ने वोटिंग के नए कानून बनाए, जिसे हांगकांग के लोगों ने सिरे से खारिज कर दिया। इसके बाद 22 सितंबर 2014 को हांगकांग के कई स्टूडेंट यूनियनों ने इसका विरोध करना शुरू किया। 26 सितंबर 2014 को इस आंदोलन से और लोग जुड़े और सरकारी मुख्यालय के सामने इकठ्ठा होकर प्रदर्शन करने लगे। ये लोग पीले कलर के बैंड और छाते अपने साथ लेकर आए थे। इसलिए इसका नाम येलो अंब्रेला प्रोटेस्टरखा गया।

  हांगकांग और चीन के सरकारी अधिकारियों ने इस प्रदर्शन को नियमों का उल्लंघन करने वाला और गैरकानूनी बताया। ये प्रदर्शन 15 दिसंबर 2014 तक चलता रहा। आंदोलन को 1989 में बीजिंग के तियानमेन चौक पर हुए प्रदर्शनों के बाद सबसे बड़ा लोकतंत्र समर्थक आंदोलन माना जाता है। हालांकि आंदोलन असफल रहा चूँकि इसे नागरिकों के बड़े वर्ग का समर्थन नहीं मिल पाया था। लेकिन वर्तमान प्रत्यर्पण विधेयक के विरोध में पिछले सबसे बड़े प्रदर्शन के मुकाबले करीब दोगुने लोग सड़कों पर उतरे हैं। इस बार प्रत्यर्पण कानून मसौदे के खिलाफ हुए आंदोलन को प्रो डेमोक्रेसीकहा गया है और प्रदर्शन को सबसे बड़ा लोकतंत्र समर्थक आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है।


चीन पर प्रभाव

  हांगकांग में हो रहे उग्र प्रदर्शन का सीधा असर चीन की व्यवस्था पर पड़ सकता है। दरअसल हांगकांग में यदि तनावपूर्ण स्थिति उत्पन्न होती है तो इसका सीधा असर एफडीआई पर पड़ेगा। साथ ही यहाँ चीन का जो पूरा वित्तीय बाजार है उसमें बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों का 40 से 50 प्रतिशत तक स्टॉक हांगकांग में ही लिस्टेड हैं, जो शंघाई और शिनजेन से कहीं ज्यादा है।

  हांगकांग इस लिहाज से भी बेहद ख़ास हो जाता है कि दीर्घकालिक निवेश का 61 फीसद केवल यहीं से आता है। यहां पर एफडीआई के आने की वजह निवेश की लचीली और सरल प्रक्रिया, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हांगकांग की साख, हांगकांग का एक फाइनेंशियल हब के रूप में उभरना है। यही वजह है कि यहां पर होने वाले प्रदर्शन या किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

  वैसे भी वर्तमान में चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट रही है। अमेरिका के साथ जारी ट्रेड वार भी इसकी एक बड़ी वजह है। विदित हो कि चीन की बड़ी कंपनी अलीबाबा भी हांगकांग के शेयरबाजार में लिस्टेड है। लेकिन वहाँ के बदलते राजनीतिक और आर्थिक माहौल में यह भी प्रभावित हो सकता है।

  हांगकांग के लोग स्वायत्तता से किसी भी तरह समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उल्लेखनीय है कि प्रत्यर्पण बिल के पहले भी हांगकांग के लोग चीन की सख्ती पर गुस्सा दिखा चुके हैं। उदाहरण के लिए चीन के राष्ट्रगान के प्रति असम्मान जाहिर करने पर दंडित करने का कानून, लोकतंत्र और आजादी समर्थक विधायकों की सदस्यता खारिज करने और आजादी समर्थक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने का विरोध होता रहा है। ऐसे में प्रस्तुत विधेयक चीन का माहौल खराब कर वहाँ आन्तरिक संघर्ष की स्थिति उत्पन कर सकता है।

  नतीजतन चीन में हिंसा तनाव का वातावरण उत्पन्न हो सकता है साथ ही चीन की अंतर्राष्ट्रीय साख पर सवाल उठ सकता है। दरअसल चीन विश्व के अन्य देशों को मानवाधिकार के मुद्दे पर घेरता आया है। वर्तमान स्थिति में चीन खुद अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में मानवाधिकार के प्रश्नों पर घिर सकता है।


आगे की राह

  निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र एवं मानवाधिकार के व्यापक प्रसार तथा साम्यवाद के पराभव के बावजूद, एशिया के विशालतम राष्ट्र चीन में साम्यवादी व्यवस्था ही कायम है। आर्थिक क्षेत्र में चीन ने भले ही कुछ उदार नीतियाँ अपनाई हो किंतु राजनीतिक रूप से चीन का लोकतंत्र विरोधी रुख अभी भी कायम है।

  चीन में 22 प्रांत, 4 प्रत्यक्ष नियंत्रण वाले नगर क्षेत्र, तिब्बत समेत 5 स्वशासी क्षेत्र तथा हांगकांग एवं मकाऊ दो विशेष प्रशासनिक क्षेत्र सम्मिलित हैं। प्रांतों एवं स्वशासी क्षेत्रों के लिए चीन की नीति वन चाइना पॉलिसीकी रही है किंतु विशेष प्रशासनिक क्षेत्रों के लिए चीन की नीति वन कंट्री टू सिस्टम्स’ (One Country, two Systems) की है। दोनों प्रशासनिक क्षेत्रों में से एक मकाऊ पूर्व पुर्तगाली उपनिवेश है जबकि दूसरा हांगकांग पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश (डिपेंडेन्सी) है।

  दोनों प्रशासनिक क्षेत्रों में, संयुक्त राष्ट्र में पंजीकृत संयुक्त घोषणाओं के तहत इंटर स्टेट ट्रीटीजके उपबंधों तथा अपने मौलिक कानूनों (बेसिक लॉज) के अंतर्गत, चीन के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक स्वायत्तता है। लेकिन यह स्वायत्तता भी इतनी अधिक नहीं है कि उसे लोकतंत्र के समकक्ष माना जा सके। ऐसे में प्रत्यर्पण कानून को स्वीकारने का मतलब है चीन के दबदबे को स्वीकार करना चीन के मनोबल को बढ़ाना जो कहीं कहीं हांगकांग के आगामी भविष्य के लिए अधोमुखी (नकारात्मक) साबित हो सकती है।