GS-Paper 2020 Current Topic Essay-02

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Essay-02


जलवायु परिवर्तन और भूमि: IPCC की विशेष रिपोर्ट (शब्द-2142)


चर्चा का कारण

  हाल ही में इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के विशेषज्ञों ने जलवायु परिवर्तन और भूमि’ (Climate Change and Land) के विषय पर एक नई रिपोर्ट पेश करते हुए यह बताया है कि भूमि की उर्वरक शक्ति प्रभावित होने से विश्व के सामने खाद्य संकट उत्पन्न होने का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिकों ने चेतावनी देते हुए कहा है कि पृथ्वी पर लगभग एक चौथाई बर्फ मुक्त भूमि को नुकसान पहुँचा है। IPCC की रिपोर्ट 2018 में कहा गया था कि हमारे पास केवल 2030 तक का समय है कि हम अपनी गलतियों को सुधारें, नहीं तो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) विनाशकारी साबित होगा।


पृष्ठभूमि

  जलवायु परिवर्तन पर अंतर्सरकारी पैनल (IPCC) की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि के प्रति इंसानी दृष्टिकोण ने जलवायु संतुलन को कम करने का काम किया है। हालांकि वानिकी लंबे समय से कार्बन सिंक बनाने पर ध्यान दे रही है, लेकिन खाद्य वस्तुओं की खपत, कृषि की आधुनिक प्रणाली और मरुस्थलीकरण ने जलवायु परिवर्तन को बढ़ाया है। IPCC की यह रिपोर्ट 8 अगस्त 2019 को जारी की गई।

  रिपोर्ट में कहा गया है कि आबादी बढ़ने, खान पान की आदतों में बदलाव, आय में वृद्धि से 2050 तक कार्बन उत्सर्जन में 30 से 40 फीसदी की वृद्धि हो सकती है।

  इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1961 के मुकाबले प्रति व्यत्तिफ़ कैलोरी में 33 फीसदी की खपत बढ़ी है, इसके बावजूद 82 करोड़ लोग अभी भी कुपोषित हैं। फिर भी वर्तमान में कुल खाद्य उत्पादन का 25 से 30 फीसदी हिस्सा बर्बाद किया जा रहा है, जो सीधे-सीधे जलवायु को नुकसान पहुँचा रहा है।


IPCC की रिपोर्ट

  पहली बार ऐसा हुआ है कि IPCC, जिसका काम जलवायु परिवर्तन विज्ञान के बारे में वैज्ञानिक साहित्य (Scientific literature) का आकलन करना है, ने अपना ध्यान पूरी तरह से भूमि क्षेत्र पर केन्द्रित किया है। वर्ष 2018 में, संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन पर अंतर्सरकारी पैनल (IPCC) ने कहा था कि 2030 तक पृथ्वी के औसत तापमान में पूर्व-औद्योगिक स्तरों से ऊपर 1.5 डिग्री सेल्सियस की औसत वृद्धि होगी, जिससे अत्यधिक सूखे, जंगलों में आग, बाढ़ और करोड़ों लोगों के लिए खाद्यान्न की कमी का खतरा बढ़ जाएगा। जलवायु परिवर्तन के विशिष्ट पहलुओं की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करने के लिए सरकारों द्वारा इन रिपोर्टों की माँग की गयी थी।

  इस रिपोर्ट में वैश्विक तापन (Global warming) के लिए भूमि संबंधी गतिविधियों के योगदान के बारे में बताया गया है कि किस प्रकार से भूमि पर होने वाले विभिन्न प्रकार की गतिविधियों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाया है, उदाहरण के लिए- कृषि, उद्योग, वानिकी, पशुपालन और शहरीकरण। इस रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि खाद्य उत्पादन जैसी गतिविधियाँ केवल वैश्विक तापन में योगदान देती हैं बल्कि इससे प्रभावित भी होती हैं।

  इस रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्पादन पूर्व (pre-production) की गतिविधियाँ, जैसे- पशुपालन और उत्पादन बाद (post-production) की गतिविधियाँ, जैसे- परिवहन, ऊर्जा और खाद्य प्रसंस्करण को यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो खाद्य उत्पादन प्रत्येक वर्ष ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 37 प्रतिशत का योगदान देता है। गौरतलब है कि उत्पादित सभी खाद्य पदार्थों का लगभग 25 प्रतिशत या तो नष्ट हो जाता है या बर्बाद हो जाता है। साथ ही कचरे के अपघटन से भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।

  इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) के द्वारा जलवायु परितर्वन संबंधी मुद्दे पर आए बड़े निष्कर्ष के लगभग एक साल बाद ये चेतावनी आई है।

  दूसरी IPCC रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन और भूमि क्षरण के दुष्चक्र को उजागर करती है।

  IPCC के एक अधिकारी ने कहा कि हम मनुष्य 70% से अधिक बर्फ मुक्त भूमि को प्रभावित करते हैं, इस भूमि का एक चौथाई हिस्सा खराब हो जाता है, जिस तरह से हम भोजन का उत्पादन करते हैं और जो खाते हैं वह प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान और जैव विविधता के ह्वास में भूमिका निभाता है। जलवायु परिवर्तन से सूखे, बाढ़ और गर्मी की लहरों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है, जो अपरिवर्तनीय रूप से प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों को नष्ट कर सकता है और खाद्यान्न संकट को जन्म दे सकते हैं।


इस रिपोर्ट के कुछ प्रमुख बिंदु

 

  दक्षिण अमेरिका का आकार छोटा होनाः यहाँ रासायनिक उर्वरकों, वनों की कटाई और गहन खेती की वजह से पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों में कमी आनी शुरू हो गई है। इस नुकसान प्रक्रिया में, दक्षिण अमेरिका का आकार में दो अरब हेक्टेयर भूमि को नुकसान पहुँचा है।

 

  फूड वेस्ट और मांसाहार पर रोक लगाने की जरूरतः IPCC की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर हम वैश्विक उत्सर्जन को कम करना चाहते हैं तो फूड वेस्ट और मांस की खपत को कम करना होगा। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग में दोनों का बड़ा योगदान है। फूड वेस्ट 8-10% और 14.5% के बीच वैश्विक उत्सर्जन करता है। इस रिपोर्ट के मुताबिक उत्पादित सभी खाद्य पदार्थों का 25-30% कभी नहीं ऽाया जाता है, जबकि दुनिया भर में 821 मिलियन लोग अल्पपोषित हैं।

 

  प्राकृतिक कार्बन सिंक को बहाल करने की जरूरतः वन और वेटलैंड्स महत्वपूर्ण कार्बन सिंक हैं, लेकिन इंसानी गतिविधियों से ये बहुत कम हो गए हैं। IPCC ने चेतावनी दी है कि मानव कार्यों के आधार पर कार्बन की अत्यधिक उपयोग करने की उनकी क्षमता की वजह से ये समस्या बनी रह सकती हैं।

 

  जलवायु परिवर्तन से खाद्य सुरक्षा को खतराः भोजन प्रणाली जलवायु परिवर्तन का एक प्रमुख कारक है साथ ही जलवायु परिवर्तन से ये खुद भी प्रभावित होता है।

  जलवायु परिवर्तन चरम मौसम की घटनाओं की बारंबारता और तीव्रता को बढ़ाता है, जैसे कि सूखा और बाढ़, जो फसलों और महत्वपूर्ण कृषि अवसंरचना को नष्ट करते हैं।

 

  बायो एनर्जी समाधन नहीं: IPCC ने पिछले साल अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी थी कि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर वैश्विक तापमान रखने पर कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (BECCS) जैसी तकनीकों का उपयोग करके वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने की जरूरत होगी। लेकिन अपनी नई रिपोर्ट में, IPCC ने कहा कि बड़े पैमाने पर इस तकनीक को जल्दी ही हटाना होगा।


वर्तमान परिदृश्य

  इस रिपोर्ट में बताया गया है कि खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का अनुमान है कि लगभग 4.4 गीगाटन खाने की वस्तुएँ खराब की गई, जो 2011 में कुल कार्बन उत्सर्जन का 8 फीसदी था। साथ ही खाने-पीने की आदत में बदलाव करके 1.8 से 3.4 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड सालाना कम किया जा सकता है।

  खानपान पर बहस अकसर शाकाहारी और मांस की खपत या विभिन्न धर्मों के आधार पर होती है, लेकिन IPCC ने अपील की है कि इसे आस्था, संस्कृति या धर्म के आधार पर तय नहीं किया जाना चाहिए बल्कि मोटे अनाज, फल और सब्जियाँ, नट और बीज तक पहुँच बढ़ाना और मांस की वजह से होने वाले कार्बन फुटप्रिंट को कम करना होगा। साथ ही, खाने को बर्बाद होने से बचाने की सख्त जरूरत है। इसके लिए सप्लाई चेन प्रबंधन को सुदृढ़ कर लाखों डॉलर की बचत की जा सकती है।

  IPCC ने स्पष्ट किया है कि आधुनिक कृषि प्रणाली ने भी जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा दिया है। इससे नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। यह एक ऐसी ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाईऑक्साइड के मुकाबले 300 गुणा अधिक नुकसानदायक है। 1961 के मुकाबले अब जमीन से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग दोगुना वृद्धि हो चुकी है, जो हर साल लगभग 3 मेगाटन कृषि भूमि की मिट्टी में मिल रहा है। IPCC ने मिट्टी में खराब नाइट्रोजन के इस्तेमाल की ओर इशारा किया है।

  रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में सुधार करने के नाम पर जिन तकनीकों का सहारा लिया गया, उससे हालात सुधरने की बजाय बिगड़े हैं, खासकर उससे जलवायु परिवर्तन का असर बढ़ा है। रिपोर्ट में विकासशील देशों में छोटी जोत को कृषि क्षेत्र के लिए चुनौती बताया गया है।


IPCC क्या है?

  IPCC जलवायु परिवर्तन के आकलन के लिए बनाई गई एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है। इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम तथा विश्व मौसम विज्ञान संगठन द्वारा वर्ष 1988 में की गई थी। इसका मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित है। वर्तमान में विश्व के 195 देश इसके सदस्य हैं। इसमें विश्व के विभिन्न देशों के वैज्ञानिकों के समूह कार्य करते हैं साथ ही वे जलवायु परिवर्तन का नियमित आकलन करते हैं। प्रत्येक 5-6 वर्ष उपरांत IPCC जलवायु परिवर्तन पर एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।


प्रमुख कारण

  वनों की कटाई और अव्यवस्थित कृषि ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ावा देती है। वनों की कटाई और अव्यवस्थित कृषि प्रणाली वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने और ग्रीनहाउस गैसों की विशाल मात्र में उत्सर्जन करने की भूमि की क्षमता को कमजोर करती है। गौरतलब है कि जब भूमि का क्षरण होता है, तो यह कार्बन को ग्रहण करने की मिट्टी की क्षमता को कम कर देती है और यह जलवायु परिवर्तन को बढ़ा देती है। जलवायु परिवर्तन कई अलग-अलग तरीकों से भूमि क्षरण को बढ़ावा देता है। आज के दौर में 500 मिलियन लोग ऐसे क्षेत्रें में रहते हैं जो मरुस्थलीकरण से प्रभावित हैं।

  वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु संकट को रोकने के लिए हमें तुरंत भूमि को प्रबंधित करने, भोजन बनाने और कम मांस खाने पर जोर देना होगा। IPCC रिपोर्ट में नुकसान को दूर करने के लिए प्रमुख अवसर बताए गए हैं। कृषि भूमि पर वृक्षारोपण करना, एग्रोफॉरेस्ट्री, बेहतर मिट्टी प्रबंधन और फूड वेस्ट को कम करना बेहतर समाधान हैं जो भूमि उत्पादकता को बढ़ावा दे सकते हैं और उत्सर्जन को कम कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वैश्विक खाद्य उत्पादन प्रणाली का 16 से 27 प्रतिशत योगदान हो सकता है। यदि इसमें परिवहन और खाद्य प्रसंस्करण जैसे कारकों को शामिल कर लिया जाय तो यह 27 प्रतिशत से बढ़कर 37 प्रतिशत तक हो सकता है। तापमान में वैश्विक वृद्धि सभी ग्रहों की तुलना में पृथ्वी पर सबसे तेजी से हुई है। भूमि पर इस अतिरिक्त वैश्विक तापन से गर्मी से संबंधित घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि में वृद्धि हो सकती है।


भूमि और जलवायु परिवर्तन

  भूमि का उपयोग और भूमि के उपयोग में आने वाले परिवर्तन हमेशा से जलवायु परिवर्तन संबंधी बातचीत का अभिन्न हिस्सा रहा है, क्योंकि भूमि कृषि, संबंधी गतिविधियों के साथ-साथ कार्बन सिंक के रूप में कार्य करती है। उदाहरणस्वरूप, कृषि और पशुपालन मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड का एक प्रमुख स्रोत है। दोनों ही गैस ग्रीनहाउस गैस के रूप में कार्बन डाईऑक्साइड की तुलना में सैकडों गुना अधिक खतरनाक हैं।

  हालांकि मिट्टी, पेड़, वृक्षारोपण और वन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के लिए कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जिससे वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड गैसों में कमी आती है।

  गौरतलब है कि बड़े पैमाने पर भूमि के उपयोग में परिवर्तन होने से जैसा कि वनों की कटाई अथवा शहरीकरण या यहाँ तक कि फसल के पैटर्न में बदलाव से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।


भूमि, महासागर और वन

  कार्बन चक्र में प्राकृतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से भूमि और महासागर प्रत्येक वर्ष लगभग 50 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों को अवशोषित करते हैं। कार्बन सिंक के रूप में भूमि और महासागर का काफी महत्त्व है और इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने में इसका महत्वपूर्ण योगदान है, इसीलिए वनीकरण और वनों की कटाई में कमी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक रणनीति में एक महत्वपूर्ण कदम है।

  जलवायु परिवर्तन पर भारत की कार्य योजना, वनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण घटक है। भारत सरकार का कहना है कि वह अपने वनों को बढ़ाकर और अधिक पेड़ लगाकर वर्ष 2032 तक लगभग 2.5 बिलियन से 3 बिलियन टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाएगा।


आगे की राह

  IPCC रिपोर्ट किसी भी नीति के लिए निर्देश नहीं पेश करता है। वे कार्रवाई के सर्वोत्तम पाठ्यक्रम की सिफारिश भी नहीं करते हैं। इसके बजाय, वे केवल भिन्न-भिन्न देशों द्वारा विभिन्न धारणाओं के तहत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए संभावित मार्ग प्रदान करते हैं। इसमें कहा गया है कि वर्ष 2050 तक कृषि और पशुधन गतिविधियों से प्रति वर्ष 2.3 और 9.6 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड से बचना संभव हो पाएगा। इसी प्रकार लोगों की आदतों में बदलाव लाकर वर्ष 2050 तक प्रत्येक वर्ष 8 बिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर बचना संभव हो पाएगा।

  खाद्य अपव्यय में कमी, सतत कृषि प्रथाओं और आहार वरीयताओं के स्थानांतरण जैसे उपायों में पौधे आधारित भोजन को शामिल कर खाद्य सुरक्षा को संकट में डाले बगैर उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। वास्तव में यह मानव स्वास्थ्य के संदर्भ में लाभकारी होगा।

  गौरतलब है कि IPCC रिपोर्ट ने जो सख्त चेतावनी दी है, उसके पश्चात वैश्विक स्तर पर लोगों की जीवन शैली में बदलाव लाने की जरूरत है, ताकि जलवायु परिवर्तन से बचाव संभव हो सके। साथ ही जलवायु परिवर्तन संबंधी समझौते की राह में जो भी बाधाएँ हैं, उन्हें दूर करने की आवश्यकता है और सभी देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने के लिए खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकनी होगी। हालाँकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का ही नतीजा है कि जल संकट पर काबू पाना अपेक्षाकृत मुश्किल प्रतीत हो रहा है जिससे कि विकट भविष्य में लगभग 27 करोड़ लोगों को इस समस्याओं को सामना करना पड़ सकता है, इसलिए समय रहते ही वैश्विक स्तर पर कुछ ठोस पहल किए जाने की आवश्यकता है।