GS-Paper 2020 Current Topic Essay-01

GS-Paper 2020 Current Topic

Essay-01


राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) विधेयक, 2019: एक अवलोकन (शब्द-2161)


चर्चा का कारण

  हाल ही में लोकसभा के बाद राज्यसभा में भी राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2019 (National Medical Commission Bill, 2019) पास कर दिया गया। इसके तहत मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के स्थान पर एक नई संस्था राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग’ (National Medical Commission) का गठन किया जाएगा। सरकार ने इस विधेयक को देश में मेडिकल एजुकेशन की दिशा में सबसे बड़ा सुधार करार दिया है। इस विधेयक के तहत इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट, 1956 को हटा दिया जाएगा।


राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2019 क्या है?

  राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) विधेयक, 2019 के कानून बनने से निजी मेडिकल कॉलेजों की मनचाही फीस वसूलने पर रोक लग जाएगी। दरअसल कई प्राइवेट मेडिकल कॉलेज ऐसे हैं जो मैनेजमेंट कोटे की सीटों को एक-एक करोड़ रुपये में अयोग्य छात्रों को बेच देते थे। ये कॉलेज साढ़े चार वर्षीय MBBS के लिए हर साल करीब 15 से 25 लाख रुपये तक सालाना की फीस वसूलते हैं। लेकिन विधेयक के पास होने के बाद कॉलेजों की इस मनमानी पर काफी हद तक रोक लग जाएगी।

  दरअसल इस विधेयक के कानून बनने के बाद निजी कॉलेजों की 20 हजार सीटों पर फीस सरकार तय करेगी। फिलहाल देश में मेडिकल की 80 हजार सीटें हैं। इनमें आधी यानी 40 हजार सीटें सरकार के पास हैं और बाकी 40 हजार सीटें निजी कॉलेजों के पास हैं। यदि ये कानून बनता है तो निजी कॉलेजों की 40 हजार सीटों की 50 फीसदी सीटों पर भी सरकार फीस तय कर सकेगी। इस तरह सरकार 60 हजार सीटों पर फीस तय कर सकेगी।

  इसके अलावा निजी कॉलेजों में एडमिशन के लिए भी नीट (NEET) पास करना होगा। केवल डोनेशन के आधार पर छात्रों को प्रवेश नहीं मिल सकेगा। इससे अयोग्य छात्रों को प्रवेश मिलने पर रोक लगेगी और केवल वही छात्र प्रवेश पा सकेंगे जो सही अर्थों में योग्य हैं।

  इस विधेयक के अनुसार राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में राज्य चिकित्सा संस्थान शिक्षा और ट्रेनिंग के बारे में अपनी समस्याएँ और सुझाव दर्ज करा सकेंगे। केन्द्र सरकार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) का भी गठन करेगी जो राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को मेडिकल शिक्षा से संबंधित सुझाव देगी।


राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC)

  राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC) मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग के बारे में राज्यों को अपनी समस्याएँ और सुझाव रखने का मौका देगी। ये परिषद चिकित्सा आयोग को सुझाव देगी कि मेडिकल शिक्षा को कैसे और अच्छा बनाया जाए।

  25 सदस्यों में से 11 सदस्य विभिन्न राज्यों से होंगे। इनमें से 21 सदस्य डॉक्टर होंगे, जो डॉक्टरों की न्यूनतम योग्यता का निर्धारण करेंगे।

  राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की धारा 58 के अनुसार, इस कानून के प्रभावी होते ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के साथ इसके अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवाएँ समाप्त हो जाएंगी। इसके एवज में उन्हें तीन महीने का वेतन और भत्ते मिलेंगे।

  नए विधेयक के लागू होते ही देश के सभी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए केवल एक परीक्षा ही ली जाएगी। इस परीक्षा का नाम नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (NEET) होगा।

  इस विधेयक में मेडिकल रिसर्च को बढ़ाने का प्रावधान है। स्नातक और परास्नातक स्तर पर डॉक्टरों को दक्ष बनाने के लिए मेडिकल रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

  इस विधेयक में किए गए प्रावधान के अनुसार MBBS के अंतिम वर्ष के छात्र इस परीक्षा को पास करके पोस्ट ग्रेजुएशन में प्रवेश पा सकेंगे। इसके अतिरिक्त यदि कोई ग्रेजुएट किसी विदेशी विश्वविद्यालय से भारत आते हैं तो उन्हें यहां प्रैक्टिस करने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट पास करना होगा।

  राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग समय-समय पर सभी चिकित्सा संस्थानों का मूल्यांकन भी करेगा। आयोग भारत के लिए एक मेडिकल रजिस्टर के रख-रखाव की सुविधा प्रदान करेगा तथा मेडिकल सेवा के सभी पहलुओं में नैतिक मानदंड को भी लागू करवाएगा।

  इस विधेयक के धारा 49 के अनुसार एक ब्रिज कोर्स करने के बाद आयुर्वेद, होम्योपैथी के डॉक्टर भी एलोपैथी इलाज करने के योग्य हो जाएंगे।


क्या है ब्रिज कोर्स’?

  इस विधेयक में यह सबसे विवादास्पद प्रावधान है, जिस पर सत्ताधारी दल के सांसदों ने भी आपत्ति जतायी है। ब्रिज कोर्स पर समिति (2018) ने कहा था कि ब्रिज कोर्स को अनिवार्य प्रावधान नहीं बनाया जा सकता, हालांकि समिति ने हेल्थकेयर सेक्टर में मानव संसाधन की सक्षमता को बढ़ाने पर जोर दिया था, जिससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के उद्देश्यों को हासिल किया जा सके।

  समिति का मानना है कि प्रत्येक राज्य के समक्ष स्वास्थ्य से जुड़े अपने मसले हैं। इस पर समिति अनुशंसा करती है कि प्रत्येक राज्य सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों के क्षमता निर्माण में अपने मानकों को तय कर सकती हैं। इसमें आयुष चिकित्सक, बीएससी (नर्सिंग), BDS, बीफार्मा आदि शामिल हैं।


उद्देश्य

  इस विधेयक का मकसद है देश में मेडिकल एजुकेशन व्यवस्था को दुरुस्त और पारदर्शी बनाना। देश में एक ऐसी चिकित्सा शिक्षा (Medical Education) की प्रणाली बनाई जाए जो विश्व स्तर की हो।

  प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग यह सुनिश्चित करेगा कि चिकित्सा शिक्षा के स्नातक और परास्नातक दोनों स्तरों पर उच्च कोटि के डॉक्टर मुहैया कराये जाएँ।

  राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग चिकित्सा प्रोफेशनल्स को इस बात के लिए प्रोत्साहित करेगा कि वे अपने क्षेत्र के नवीनतम मेडिकल रिसर्च को अपने काम में सम्मिलित करें और ऐसे रिसर्च में अपना योगदान करें। आयोग समय-समय पर सभी चिकित्सा संस्थानों का मूल्यांकन भी करेगा।

  राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2019 का मकसद चिकित्सा क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर रोक लगाना है।

  उल्लेखनीय है कि NMC की देखरेख में स्वायत्त बोर्ड का गठन होगा। प्रत्येक स्वायत्त बोर्ड में एक प्रेसिडेंट और चार सदस्य होंगे, जिन्हें केंद्र सरकार नियुत्तफ़ करेगी। इन स्वायत्त बोर्ड के तहत अंडर-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड, मेडिकल एसेसमेंट रेटिंग बोर्ड और एथिक्स मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड शामिल होंगे। इन्हें निम्नलिखित बिंदुओं के तहत देखा जा सकता है-

 

  अंडर-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (UGMEB PGMEB): यह बोर्ड अंडर-ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर मानक, पाठ्यक्रम दिशा-निर्देश तैयार करेगा।

 

  मेडिकल एसेसमेंट रेटिंग बोर्ड (MARB): न्यूनतम मानकों को बनाये रखने में विफल चिकित्सा संस्थानों पर आर्थिक दंड लगाने की शत्तिफ़ इस बोर्ड के पास होगी। नये मेडिकल कॉलेज की स्थापना, किसी भी पोस्ट-ग्रेजुएट पाठ्यक्रम को शुरू करने या सीटों की संख्या बढ़ाने की अनुमति भी एमआरबी ही देगा।

 

  एथिक्स मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड (EMRB): यह बोर्ड सभी लाइसेंस प्राप्त मेडिकल प्रैक्टिसनर के लिए एक नेशनल रजिस्टर बनायेगा और उनके पेशेवर आचरण की निगरानी करेगा। रजिस्टर में शामिल होने वाले मेडिकल प्रैक्टिसनर को ही मेडिसिन प्रैक्टिस की अनुमति होगी। सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाताओं के लिए अलग नेशनल रजिस्टर बनेगा।

 

  सामुदायिक स्वास्थ्य प्रदाताः NMC, कुछ मध्य स्तर के चिकित्सकों को मेडिसिन प्रैक्टिस के लिए सीमित लाइसेंस दे सकती है- ये चिकित्सक प्राथमिक और निवारक स्वास्थ्य देखभाल में निर्दिष्ट दवा लिख सकते हैं। इन चिकित्सकों को केवल पंजीकृत चिकित्सकों की देखरेख में ही दवा लिखने की अनुमति होगी।


आवश्यकता क्यों?

  विधेयक के उद्देश्यों में कहा गया है कि आयुर्विज्ञान शिक्षा किसी भी देश में अच्छी स्वास्थ्य देखरेख प्राप्त करने के लिये महत्वपूर्ण है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग से संबंधित संसद की एक स्थायी समिति ने अपनी 92वीं रिपोर्ट में आयुर्विज्ञान शिक्षा और चिकित्सा व्यवसाय की विनियामक पद्धति का पुनर्गठन और सुधार करने के लिये डा- रंजीत राय चौधरी की अध्यक्षता वाले विशेष समूह द्वारा सुझाए गए विनियामक ढाँचे के अनुसार भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद में सुधार करने के लिये कदम उठाने की सिफारिश की थी।

  उच्चतम न्यायालय ने 2009 में मॉडर्न डेंटल कॉलेज रिसर्च सेंटर तथा अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में 2 मई 2016 को अपने निर्णय में केंद्रीय सरकार को राय चौधरी समिति की सिफारिशों पर विचार करने और समुचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इन सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए लोकसभा में 29 दिसंबर 2017 को राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग विधेयक 2017 पुनःस्थापित किया गया था, इसे बाद में विचारार्थ संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया। स्थायी समिति ने बाद में उत्तफ़ विधेयक पर अपनी रिपोर्ट पेश की।

  समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 28 मार्च 2018 को लोकसभा में लंबित विधेयक के संबंध में आवश्यक शासकीय संशोधन प्रस्तुत किया था लेकिन इसे विचार एवं पारित किये जाने के लिये नहीं लाया जा सका। 16वीं लोकसभा के विघटन के बाद यह समाप्त हो गया। परिणामस्वरूप यह बिल पास नहीं हो सका।

  देश में मौजूद स्वास्थ्य संकट की मुख्य वजहों में बढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण, गरीबी और खाद्य असुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कारक जिम्मेदार हैं। इसके अलावा डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी, स्वास्थ्य पर कम खर्च और स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण होने से स्वास्थ्य सेवाएँ काफी महंगी हुई हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रलय की ओर से जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में औसतन एक डॉक्टर पर करीब 11 हजार की जनसंख्या निर्भर है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तय मानकों के मुताबिक 1 डॉक्टर पर सिर्फ 1 हजार जनसंख्या होनी चाहिए।

  भारत में नागरिकों को स्वास्थ्य का अधिकार भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में मिला हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में स्वास्थ्य के अधिकार को जीवन का अधिकार बताया है। इसके अलावा संविधान का अनुच्छेद 47 भी राज्यों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार, पोषण स्तर में बढ़ावा और जीवन स्तर को बेहतर बनाने की जिम्मेदारी देता है।

  भारत सरकार स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च में लगातार बढ़ोत्तरी कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत साल 2025 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च को GDP का 2.5 प्रतिशत तक बढाने का लक्ष्य तय किया गया है। इसके अलावा देश के हर क्षेत्र में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित करने का अब समय गया है। विशेषज्ञों का भी कहना है कि पुरानी व्यवस्था से आगे बढ़ने के लिए संरचना में बदलाव जरूरी है। मौजूदा वक्त में यदि कानून द्वारा व्यवस्था नहीं बदली जाती है तो डब्ल्यूएचओ (WHO) के मानकों के आधार पर तय लक्ष्यों को हासिल कर पाना भारत के लिए मुश्किल होगा। इसलिए अब समय गया है कि देश में डॉक्टरों की संख्या, बेहतर प्रशिक्षण और हर क्षेत्र में उनकी उपलब्धता को जल्द से जल्द सुनिश्चित किया जाए। इसलिए इस बिल का कानून बनना अति आवश्यक हो गया है। इन सब के अतिरिक्त स्वास्थ्य सेवाओं और उन पर होने वाले खर्चों की सही तरीके से निगरानी हो इसलिए भी यह विधेयक आवश्यक हो गया था।


इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की दलील

  इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इस बिल का विरोध करने की वजह बताते हुए कहा कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन 1956 में आधुनिक चिकित्सा सेवा को पंजीकृत करने और दिशा निर्देशित करने के लिए किया गया था। इसके अलावा यह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को भी देखता है। IMA का कहना है कि इस बिल से मेडिकल कॉलेजों में चिकित्सा शिक्षा महंगी हो जाएगी। जबकि इस बिल में मौजूद धारा-32 के तहत करीब 3.5 लाख गैर-चिकित्सा शिक्षा प्राप्त लोगों को एलोपैथी में इलाज करने का लाइसेंस मिलेगा जिससे मरीजों को खतरा हो सकता है।

  इस विधेयक के अनुसार आयुर्वेद और होम्योपैथी डॉक्टर ब्रिज कोर्स करके एलोपैथिक इलाज कर सकेंगे, जिससे नीम-हकीम और झोलाछाप डॉक्टरों को बढ़ावा मिलेगा।

  IMA ने कहा कि बिल में कम्युनिटी हेल्थ प्रोवाइडर शब्द को सही से परिभाषित नहीं किया गया है। जिससे नर्स, फार्मासिस्ट और पैरामेडिक्स आधुनिक दवाइयों के साथ प्रैक्टिस कर सकेंगे। इसके अलावा निजी मेडिकल कॉलेज प्रबंधन अपने हिस्से की सीटों को मनमर्जी के दाम में बेचने लगेंगे।

  डॉक्टर्स नीट से पहले नेक्सट को अनिवार्य किए जाने के भी खिलाफ हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की मेडिकल क्षेत्र में आने की संभावना कम हो सकती है। साथ ही नये प्रावधान के अनुसार पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रैक्टिस शुरू करने के लिए डॉक्टरों को एक टेस्ट पास करना होगा। डॉक्टरों का कहना है कि इस टेस्ट में एक बार नाकाम रहने के बाद दोबारा टेस्ट देने का विकल्प नहीं दिया गया है।


नेशनल एक्जिट टेस्ट (NEXT) क्या है?

  इस बिल के पास होने के बाद अब MBBS (Bachelor of Medicine and Bachelor of Surgery) पास करने के बाद प्रैक्टिस के लिए नेशनल एक्जिट टेस्ट (NEXT) देना होगा। नेशनल एक्जिट टेस्ट अभी केवल विदेश से मेडिकल पढ़कर आने वाले छात्र देते हैं। डॉक्टरों को MBBS कोर्स के बाद मेडिकल प्रैक्टिस के लाइसेंस हेतु अब नेशनल एक्जिट टेस्ट की परीक्षा में पास होना होगा। उन्हें इस टेस्ट को पास करने के बाद ही मेडिकल प्रैक्टिस हेतु लाइसेंस मिलेगा।


निष्कर्ष

  परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है इसलिए समाज और नागरिक हित में परिवर्तन होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अपरिहार्य है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक, 2019 को भी इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। भारत एक विकासशील देश है और इसके सामने स्वास्थ्य संबंधी अनेक चुनौतियाँ हैं, इसलिए उन चुनौतियों से निपटने के लिए जो भी सुधारवादी कदम हैं उनकों लागू किया जाना चाहिए। हालांकि स्वास्थ्य संबंधी क्षेत्र में डॉक्टर एक अहम हिस्सा है, इसलिए उनकी समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा और देखना होगा कि इस विधेयक के कानून बन जाने से कहीं उनकी कार्यप्रणाली तो प्रभावित नहीं होगी।

  इसके अलावा इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि यह विधेयक कानून बनकर सिर्फ फाइलों की शोभा बढ़ाये बल्कि इसके उचित और पारदर्शी क्रियान्वयन पर भी जोर देना होगा ताकि इसके उद्देश्य को सफलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके।

  अंततः यह कहा जा सकता है कि इस तरह के महत्वपूर्ण विधेयकों पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए और समाज के सभी वर्गों से राय माँग कर ही कोई ठोस निर्णय लेना चाहिए ताकि एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की सार्थकता सिद्ध हो सके।