। प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत।
। Source of Ancient Indian History। Part-5।

4. जीवनियाँ
→ साहित्यिक सामग्रियों में जीवनियों का काफी महत्त्व है। इन जीवनियों को यदि प्रशस्ति-काव्य कहा जाय तो अनुचित न होगा क्योंकि इनके लेखकों ने अपने आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा में अपनी लेखनी का सदुपयोग किया है। उन लेखकों का दृष्टिकोण पूर्णतया साहित्यिक था। वास्तव में, साहित्य-सृजन के निमित्त ही उन्होंने राजाओं का परम्परानुसार आश्रय लिया था। अपनी साहित्यिक प्रतिभा के कारण ही वे आज तक सम्मानित हैं। इन जीवनी-लेखकों अथवा प्रशस्ति-गायकों की संख्या बहुत है, पर उनमें से कुछ ही ऐतिहासिक सामग्री प्रदान करते हैं। एक साहित्यिक ग्रन्थ में उपमाओं कि जो झड़ी, अलंकारों का जैसा अलंकार तथा अत्युक्ति की जो युक्ति होनी चाहिए, वे सब इन जीवनियों में हैं। इन ग्रन्थों की साहित्यिकता ही इनकी ऐतिहासिकता को ठेस पहुंचाती हैं।
→ हर्षचरित- जीवनी-साहित्य में ऐतिहासिक दृष्टिकोण से हर्षचरित का बहुत ऊंचा स्थान है। इस काव्यात्मक संस्कृत गद्य की रचना संस्कृत गद्याचार्य बाणभट्ट ने लगभग 620 ई. में की थी। बाण कन्नौज तथा थानेश्वर के राजा हर्ष के दरबार में रहता था। अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय बाण ने हर्षचरित के अतिरिक्त अपने अन्य ग्रन्थ कादम्बरी में भी दिया; किन्तु कादम्बरी का कोई महत्त्व ऐतिहासिक सामग्री प्रदान करने में नहीं है। बाण ने अपने आश्रयदाता हर्ष का जीवन-चरित्र अपने महान् ग्रन्थ हर्षचरित में लिखा, जिसकी महत्ता इतिहास की दृष्टि से सर्वमान्य है। हर्ष के प्रारम्भिक जीवन तथा उसकी दिग्विजयों का पूर्ण विवरण हर्षचरित से प्राप्त किया जा सकता है।
→ अधिकांश जीवनी ग्रन्थ पूर्णतया साहित्यिक हैं। उनका वर्णन आलंकारिक है, अतः वे इतिहास से बहुत दूर चले जाते हैं, यद्यपि उनसे तत्कालीन अवस्था का थोड़ा-बहुत ज्ञान अवश्य प्राप्त हो जाता है परन्तु साहित्यिक ग्रन्थ होने के नाते इन्हें विशुद्ध साहित्य की कोटि में रखा जा सकता था, किन्तु ये जीवनी भी हैं, जिनका स्वत: एक पृथक् वर्ग है।
5. विशुद्ध साहित्य
→ विशुद्ध साहित्य से हमारा अभिप्राय उन साहित्यिक ग्रन्थों से है जिनकी रचना साहित्यकार ने कला कला के लिए के दृष्टिकोण से की है। आत्मसन्तोष या किसी अन्य प्रेरणा से वशीभूत होकर इस कोटि के ग्रन्थों की रचना हुई। इन ग्रन्थों से इतिहास का एक अंग-सभ्यता एवं संस्कृति-प्रकाशयुक्त होता है। विशुद्ध साहित्यिक ग्रन्थों से हमें उनके समय का प्रचलित भाषा, साहित्य, जनसाधारण की अभिरुचि या संक्षेप में सामाजिक अवस्था का बोध होता है। इन ग्रन्थों में हर्ष के तीन नाटक-नागानन्द, रत्नावली तथा प्रियदर्शिका विशेष उल्लेखनीय हैं। इन नाटकों से सातवीं शताब्दी के भारत पर थोड़ा-बहुत प्रकाश पड़ता है। कालिदास के कुछ नाटकों की गणना भी इसी कोटि के ग्रन्थों में की जा सकती है। बौद्ध जातकों के पश्चात् सातवीं-आठवीं शताब्दी में कथाग्रन्थों की रचना में पुन: एक बाढ़-सी आयी। इन ग्रन्थों में गुणाढ्य की वैशाली बृहत्कथा (जो लुप्त हो चुकी है, पर जिसका उल्लेख अनेक लेखकों ने किया है), बुद्ध स्वामी की बृहत्कथा, क्षेमेन्द्र की बृहत्कथा मंजरी तथा सोमदेव का कथासरितसागर विशेष उल्लेखनीय हैं।
पुरातात्त्विक सामग्री
साहित्यिक सामग्री की भाँति पुरातात्त्विक सामग्री का भी इतिहास जानने के लिए बराबर का महत्त्व है-
→ अभिलेख - अभिलेखों की उपयोगिता के विषय में केवल इतना कहना होगा कि जहाँ हर प्रकार के साधन शिथिल पड़ जाते हैं, वहाँ इन अभिलेखों से ही कुछ इतिहास जाना जा सकता है। प्राचीन भारत की राजनैतिक अवस्था पर जितना प्रकाश इन अभिलेखों से पड़ सकता है, उतना अन्य किसी साहित्यिक या पुरातात्त्विक सामग्री से नहीं। प्राचीन भारत का इतिहास शिलाओं, ताम्रपत्रों तथा अन्य धातुओं पर जो कुछ उन प्राचीन लोगों ने लिख दिया है, वह अमिट है। साहित्यिक सामग्री की भाँति प्राय: उसमें प्रक्षिप्तांश नहीं हो सकते। भाषाविशेष से अभिलेखों का काल भी स्पष्ट हो जाता है। कुछ अभिलेख तो ऐतिहासिक श्रृंखला को स्थापित रखने में बहुत सहायक हुए हैं।
→ दुर्भाग्यवश अशोक के पहले का कोई अभिलेख नहीं प्राप्त होता। अशोक के काल से ही अभिलेखों का आरम्भ होता है। अशोक के बाद से सम्पूर्ण भारत में अभिलेखों का बाहुल्य है। इसके अतिरिक्त कुछ विदेशी अभिलेख भी हैं जिनसे प्राचीन भारत के इतिहास की सामग्री प्राप्त की जा सकती है। भारतीय अभिलेखों को भी अशोककालीन तथा अशोक के परवर्ती, दो भागों में विभाजित किया गया है। अशोक कालीन अभिलेख से तात्पर्य स्वयं सम्राट् अशोक द्वारा निर्मित अभिलेखों से है और अशोक के परवतीं अभिलेखों में ये सभी राजकीय तथा अन्य अभिलेख आते है, जो बाद के सम्राटों द्वारा तथा उनके काल में निर्मित हुए।
→ सर्वप्रथम अशोक के अभिलेखों पर प्रकाश डालना आवश्यक है क्योंकि इनका स्वयं एक वर्ग है। अशोक जब कलिंग-विजय के पश्चात् अशोक-महान् हो गया तो अपनी आध्यात्मिक विजय के लिए उसने मानवता के मूलभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने का निश्चय किया। जनता-जनार्दन को हर प्रकार के कष्टों से मुक्त करना, उसे सुन्दर मार्ग पर लाने तथा राजा एवं प्रजा का निकट सम्बन्ध स्थापित करने के अभिप्राय से ही अशोक ने अपने सम्पूर्ण राज्य के कोने-कोने में स्तम्भ तथा शिलालेखों का जाल बिछा दिया। अपनी राजाज्ञा तथा घोषणाओं को अशोक ने स्तम्भों तथा शिलाओं पर उत्कीर्ण कराया। सर्वसाधारण को अंधकार से प्रकाश में लाने के लिए ही उसने ऐसा किया। अशोक का उद्देश्य जो कुछ भी रहा हो, पर इतिहास के विद्यार्थी के लिए ये अभिलेख अधिक मूल्यवान् हैं। अशोक कालीन सभ्यता तथा संस्कृति पर इन अभिलेखों से बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है। स्वयं अशोक ही भारतीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण अंग है और इसका पूर्ण इतिहास जानने के लिए हमें इसके अभिलेखों का ही सहारा लेना पड़ता है। अत: इन अभिलेखों की उपयोगिता इस विषय में निर्विवाद है। विश्व-इतिहास में इस प्रकार के अभिलेख नहीं पाये जाते।
→ प्राचीन भारत के इतिहास को प्रकाशित करने में अशोककालीन तथा अशोक के पश्चात् के अभिलेख ही विशेष उल्लेखनीय हैं। अब तक 1500 से भी अधिक संख्या में विभिन्न प्रकार के अभिलेख गुप्त-काल के पहले के प्राप्त हुए हैं। उन सबकी किसी न किसी विषय में उपयोगिता है, पर उन असंख्य अभिलेखों का उल्लेख करना यहाँ असम्भव है।
→ अशोक के पश्चात् के अभिलेखों में जिन्हें राजकीय कहा जा सकता है, कुछ प्रशस्तियाँ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। उनके अभाव में हमें भारतीय इतिहास के आलोक स्तम्भ तक का भी बोध न हो पाता। इसमें हरिषेण की प्रशस्ति विशेष उल्लेखनीय है। यह प्रशस्ति समुद्रगुप्त की प्रशंसा में अशोक-स्तम्भ के नीचे ही उत्कीर्ण की गयी है जो आजकल प्रयाग (इलाहाबाद) के किले में है। गुप्त-वंश के महान् सम्राट् समुद्रगुप्त की दिग्विजयों तथा उसके वैयक्तिक गुणों पर पूर्ण प्रकाश डालने वाली सामग्री इस प्रशस्ति के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। सम्भवत: इस प्रशस्ति के अभाव में हम समुद्रगुप्त की महत्ता न जान पाते। गुप्त-वंश का इतिहास जानने में कुछ अन्य अभिलेखों का भी सहारा लेना पड़ता है।
→ अनुदानों की स्वीकृति-सम्बन्धी अनेक गुप्तकालीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं जो प्राय: सभी महत्त्वपूर्ण गुप्त-नरेशों से सम्बन्धित हैं। मुहरों एवं मुद्राभिलेखों की संख्या को तो हम निश्चित रूप से एक बहुत भारी, अतः असंख्य कह सकते हैं। चन्द्रगुप्त-द्वितीय, कुमार गुप्त, स्कन्दगुप्त आदि का इतिहास इन अभिलेखों से उसी प्रकार अधिक प्रकाशित हो पाया है, जैसे प्रयाग-प्रशस्ति से समुद्रगुप्त का। गुप्तों की वंशावली के निर्माण में तो इन अभिलेखों का बहुत बड़ा हाथ है। यह अनुदान-पत्रों, मुहरों तथा मुद्राभिलेखों की ही देन है कि गुप्तों के उस अन्धकारपूर्ण इतिहास की भी एक स्थूल रूपरेखा प्रस्तुत की जा सकी है- जहाँ अन्य साक्ष्य या तो मौन थे या फिर भ्रामक विवरण प्रस्तुत कर रहे थे।
→ ऐहोल-अभिलेख से, जो चालुक्य-नृपति पुल्केशिन द्वितीय की प्रशस्ति में उत्कीर्ण किया गया है, चालुक्य-वंश के सुप्रसिद्ध सम्राट् का ज्ञान प्राप्त होता है।
→ असंख्य दानपत्र, समर्पण-पत्र तथा स्मारक के रूप में अभिलेखों का निर्माण हुआ, जिनसे तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों का बोध होता है। हथिगुम्फा का अभिलेख खारवेल राजाओं पर पूर्ण प्रकाश डालता है।
→ अभिलेख संस्कृत, प्राकृत अथवा मिश्रित, तमिल, तेलगू तथा कन्नड़ आदि भाषाओं में खुदे हुए हैं। इन विभिन्न कोटि के अभिलेखों के अध्ययन से केवल किसी विशेष राजा के विषय में ही जानकारी नहीं होती है, अपितु इनकी भाषा के आधार पर तत्कालीन शक्तिशाली अथवा प्रचलित भाषा की लोकप्रियता अथवा उसकी शक्ति का पता चलता है। साथ ही तत्कालीन साहित्यिक शैली एवं साहित्य की प्रगति का भी बोध होता है। कला के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने में ये अभिलेख अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। दानपत्रों से राज्य की सीमाओं का बोध होता है। राजा तथा प्रजा के बीच भूमि-सम्बन्धी समझौते का भी पता इन अभिलेखों से मिलता है।
→ प्रशस्ति-अभिलेखों के अतिरिक्त अन्य वर्ग के अभिलेख भी प्रशस्ति से ही आरम्भ किये जाते थे, जिनसे तत्कालीन राजकुलों का ज्ञान प्राप्त होता है।
→ उत्तरी भारत से अधिक अभिलेख दक्षिणी भारत में प्राप्त हुए हैं, किन्तु ये उतने प्राचीन नहीं हैं इसीलिए इनका ऐतिहासिक महत्त्व भी उतना नहीं है।
→ अभिलेखों में ब्राह्मी लिपि जो बाई से दाहिनी ओर को लिखी जाती है, और खरोष्टी लिपि, जो दाहिनी से बाईं ओर को लिखी जाती है, दोनों का प्रयोग किया गया है।
→ असंख्य भारतीय लेखों के अतिरिक्त कुछ विदेशी लेख भी प्राप्त हुए हैं जो हमारे इतिहास पर प्रचुर प्रकाश डालते हैं। इनमेंएशिया माइनर में बोगजकोई के लेख में वैदिक देवताओं का उल्लेख किया गया है। आर्यों के संक्रमण का बोध इस अभिलेख से होता है। पर्सिपोलस तथा नक्शेरुस्तम (ईरान) के अभिलेखों से प्राचीन भारत तथा ईरान के पारस्परिक सम्बन्ध का बोध होता है।















