Ancient History । Chapter-5 P-3


ताम्रपाषाण काल (2000 .पू. से 500 .पू.)

Chalcolithic Age - 2000 BC to 500 BC। Part-3



अन्य ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ

क्वेटा संस्कृति- 

  यहाँ से गुलाबी रंग लिए सफेद रंग के मृदभांड प्राप्त हुए हैं जिस पर काले रंग से चित्रकारी की गई है।


कुल्ली संस्कृति- 

  यहाँ पर ऑरेल स्टाइन के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ। यहाँ से अलंकृत मृदभांड का साक्ष्य मिला है जिसकी बाहरी सतह पर वृषभ का अंकन है। यहीं से दफनाने तथा कुल्ली से दाह संस्कार का साक्ष्य मिला है। यहीं से ही कच्ची ईटों के मकान का साक्ष्य प्राप्त हुआ है।


झोब संस्कृति- 

  यहाँ स्टुअर्ट पिग्गट के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ तथा यहाँ से पाँच सांस्कृतिक चरणों का संकेत मिला है। दूसरे सांस्कृतिक चरण में चाक पर बने लाल रंग के मृदभांड का साक्ष्य प्राप्त हुआ है तथा मकान बनाने हेतु पत्थर की नींव का प्रयोग किया गया। झोब संस्कृति का चौथा और पाँचवां चरण पूर्ववर्ती काल से भिन्न है तथा यह हड़प्पा सभ्यता की परवर्ती अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है। मुगलघुडई से पायाण लिंग और योनि के साक्ष्य प्राप्त हुए हे।


गैरिक मृदभांड संस्कृति- 

  गंगा यमुना दोआब में हमें गैरिक मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य मिलता है। इसका काल 2000 से 1500 .पू. निर्धारित किया गया है। गैरिक मृदभांड संस्कृति में घर सरपट के बनाए जाते थे और उस पर मिट्टी की लिपाई की जाती थी। फर्श थापी गयी मिट्टी से बनायी गयी थी। इस संस्कृति का पतन सम्भवत: बाढ़ के कारण हुआ।

  गंगा यमुना दोआब एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गैरिक मृदभांड संस्कृति का सर्वप्रथम साक्ष्य 1950 . में बदायूँ के पास रिसोली और बिजनौर के पास राजपुर परसा से प्राप्त हुआ है। अब तक कुल 110 स्थल प्रकाश में चुके हैं। आलमगीरपुर, हस्तिनापुर और अहिच्छत्र में गैरिक मृदभांड संस्कृति के अवसान के पश्चात् कुछ अंतराल तक खालीपन गया और फिर आगे चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति का विकास हुआ है; जबकि अतरंजीखेड़ा से यह साक्ष्य प्राप्त होता है कि गैरिक मृदभांड संस्कृति तथा चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के मध्य के काल में, काले एवं लाल मृदभांड संस्कृति का भी चरण रहा था।


काले लाल मृदभांड संस्कृति- 

  सर्वप्रथम 1960 . में अतरंजीखेड़ा नामक स्थल से काले लाल मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य प्राप्त हुआ। तत्पश्चात् जोधपुरा एवं नोह से भी इस संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। काले लाल मृदभांड संस्कृति का विशिष्ट लक्षण है, बर्तन के अंदर का भाग तथा बाहर के भाग में किनारा काले रंग तथा शेष बर्तन लाल रंग से चित्रित है। अतरंजीखेड़ा से गैरिक मृदभांड संस्कृति के पश्चात् काले एवं लाल मृदभांड संस्कृति का साक्ष्य प्राप्त होता है।


ताम्र निधान संस्कृति- 

  ताम्र संचय का सबसे पहला साक्ष्य 1822 . में कानपुर के पास बिठुर से प्राप्त हुआ है। अब तक ताम्र संचय के कुल 85 स्थान प्रकाश में आए हैं। इनमें ताम्र संचय का सबसे बड़ा भडार मध्य प्रदेश के गंगेरिया से प्राप्त हुआ है। यहाँ से कुल 424 उपकरण प्राप्त हुए हैं। ताम्र संचय के सबसे अधिक स्थल उत्तर प्रदेश से प्राप्त हुए हैं। यहाँ कुल 35 स्थल मिले हैं। इटावा के पास साईपाई नामक स्थल से ताम्र संचय के साथ गैरिक मृदभांड भी प्राप्त होते हैं। इस आधार पर ताम्र संचय का संबंध गैरिक मृदभांड से मान लिया गया।


चित्रित धूसर मृदभांड- 

  चित्रित धूसर मृदभांड का प्रारम्भिक साक्ष्य 1946 . में अहिच्छत्र से प्राप्त हुआ है। अब तक चित्रित धूसर मृदभांड के कुल 750 स्थल प्रकाश में चुके हैं लेकिन इनमें 30 स्थलों की खुदाई हुयी है। इनमें से चार स्थल ऐसे हैं-भगवानपुरा, दधेरी, नागर और कटपालन, जिनसे चित्रित धूसर मृदभांड के साक्ष्य मिलते हैं फिर भी इन्हें परवर्ती हड़प्पा का विस्तार माना जाता है। यहाँ से लोहे के उपकरण प्राप्त नहीं होते।

  चित्रित धूसर मृदभांड से संबंधित सबसे बड़ा स्थल हरियाणा से प्राप्त बुखारी है। चित्रित धूसर मृदभांड में मकान सरपत के बनाए जाते थे एवं उन्हें मिट्टी से पोता जाता था। गंगा यमुना दोआब क्षेत्र से प्राप्त स्थलों में लोहे के उपकरण मिले हैं। केवल हस्तिनापुर से लोहे के उपकरणों का साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। खेती (कृषि) के उपकरणों में, जखेरा में लोहे की बनी हसिया एवं कुदाली प्राप्त हुई है। खुदाई के पश्चात् हस्तिनापुर से चावल तथा अतरंजीखेड़ा से गेहूँ जौ का साक्ष्य मिला है।


उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड- 

  इसका प्रारम्भिक साक्ष्य 1930 . में तक्षशिला से प्राप्त हुआ है। अब तक कुल 1500 स्थल प्रकाश में आए हैं। इनमें 74 स्थलों की खुदायी हुयी है। उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड संस्कृति के स्तर कहीं-कहीं चित्रित धूसर मृदभांडों के ऊपर प्राप्त हुए हैं तो कहीं काले लाल मृदभांडों के ऊपर प्राप्त हुए हैं। यह आवश्यक रूप से लोहे से संलग्न है। कालांतर में यह द्वितीय नगरीकरण, पक्की ईंटों तथा आहत मुद्रा के प्रयोग में संलग्न हो गया है।