। ताम्रपाषाण काल (2000 ई.पू. से 500 ई.पू.)।
। Chalcolithic Age - 2000 BC to 500 BC। Part-2।

ताम्रपाषाणकालीन स्थल
→ मेहरगढ़- मेहरगढ़ से तीन संस्कृतियों के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं- नवपाषाणकालीन, क्वेटा संस्कृति, हड़प्पा और हड़प्पा कालीन संस्कृति। यहाँ से कपास की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है जो आर्वेरियम गोसिपियम किस्म का है। इससे कपास के आयतित होने की धारणा टूटी। ऐसा माना जाता है कि मेहरगढ़ से ही हड़प्पावासियों को कपास की जानकारी मिली थी। यहाँ से पूर्व हड़प्पाकाल में लाजवर्त मणि के प्रयोग का साक्ष्य मिला है।
मेट्ठी (पूर्वी बलूचिस्तान)-
→ यह कुल्ली-नाल संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से तैौबे को गलाकर चिन और दर्पण के निर्माण का साक्ष्य मिला है। यहाँ से दफनाने और दाह संस्कार का साक्ष्य मिला है जो इसकी अद्वितीय विशेषता है। साथ ही यहाँ से कलश शवाधान के साक्ष्य भी प्राप्त हुए हैं।
आमरी-आमरी पाकिस्तान-
1. प्राक् हड़प्पा - ताम्रपाषाण फेज I – आमरी संस्कृति
→ प्रमुख स्थल – झांगर
2. हड़प्पा - ताम्रपाषाण फेज II - हड़प्पा संस्कृति
→ प्रमुख स्थल – झूकर
3. हड़प्पोत्तर – ताम्रपाषाण फेज III - झूकर संस्कृति
4. हड़प्पोत्तर - ताम्रपाषाण फेज IV - झांगर संस्कृति
प्रमुख स्थल- आमरी
→ आमरी से पाषाण और ईट निर्मित मकान के संकेत प्राप्त होते है। यहाँ से अन्नागार का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। आमरी के लोगों द्वारा चाक निर्मित मृदभांडों का प्रयोग किया जाता था।
रानाधुंडई-
→ पाकिस्तान में गोमलघाटी के झोब लोरलाई क्षेत्र में स्थित, इस स्थल से प्राप्त मृदभांडों पर हड़प्पा की तरह चित्रकारी की गई है। यहाँ से प्राप्त मृण्मूर्तियाँ इस बात का संकेत देती हैं कि इनका निर्माण अंगप्रत्यंग जोड़कर किया जाता था। यहाँ से हड़प्पा की तरह कूबड़दार बैल की मूर्ति प्राप्त हुई है। यहाँ से सोने की पिन भी प्राप्त हुई है जो अन्य किसी भी स्थल से नहीं प्राप्त हुई है। यहाँ से घोडे की अस्थियाँ भी प्राप्त हुई हैं। कई संदभों में यह स्थल हड़प्पा से सादृश्य रखता है।
कोटदीजी-
→ सिंध क्षेत्र में स्थित इस स्थल की 1935 में धुर्रे द्वारा पहचान की गई। 1955 में एफ. ए. खान द्वारा उत्खनन कार्य प्रारंभ किया गया। यहाँ से प्राप्त सोलह स्तर दो संस्कृतियों से सम्बद्ध हैं। यहाँ से प्राप्त ऊपर के तीन स्तर हड़प्पा काल से, एक संक्रमण काल से और नीचे के बारह स्तर हड़प्पा-पूर्व काल से सम्बद्ध हैं। इसका विकास स्थानीय संस्कृति के रूप में हुआ तथा संक्रांति स्वर हड़प्पा संस्कृति के स्थानीय संस्कृति होने का प्रमाण है। यहाँ बस्ती के बाहर कच्ची ईंटों की सुरक्षा दीवार के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। कालीबंगा की तरह कोटदीजी के हड़प्पा-पूर्व संस्कृति का पतन भीषण अग्निकांड के कारण हुआ।
कालीबंगा-
→ यह सोथी कालीबंगा संस्कृति का प्रमुख स्थल है। यह स्थल दो संस्कृतियों, पूर्व संस्कृति और हडप्पाई संस्कृति से संबद्ध है। इसकी खोज 1949 में अमलानंद घोष द्वारा की गई तथा 1961 में बी. बी. लाल के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ। यहाँ से बैल की खण्डित मूर्ति प्राप्त हुई है तथा मृदभांड पर कूबड़दार बैल की आकृति मिली है। कालीबंगा में चूड़ी उद्योग का साक्ष्य मिला है। यहाँ से भारत में सर्वप्रथम जुते हुए खेत तथा कृषि प्रचयलीका प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है।
मुंडीगांक-
→ यहाँ से ऊँची दीवार तथा उसके ऊपर धूप में पकी ईंटों की बुर्ज का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ काँसे की मूठदार कुल्हाड़ियों और बसलों का प्रयोग भी किए जाने का साक्ष्य हड़प्पा काल में मिला है। साथ ही यहाँ से पक्की मिट्टी की स्त्री मृण्मूर्ति का साक्ष्य मिला है।
→ यदि अन्य आरंभिक हड़प्पा स्थलों पर गौर किया जाय, तो हम पाते कि कोटदीजी और कालीबंगा के अतिरिक्त तरकाई जिला से भी किलेबंदी का साक्ष्य मिला है। इसी प्रकार आरंभिक हड़प्पा काल में लीवान से पाषाण उद्योग का साक्ष्य मिला है। बहावलपुर क्षेत्र में हाकरा की सूखी तलहटी में 40 आरंभिक हड़प्पाकालीन स्थलों का पता चला है। कालीबंगा और कोटदीजी दोनों ही जगहों से मातृदेवी की मृण्मूर्ति, अन्नागार और किलेबंदी का साक्ष्य प्राप्त हुआ है और दोनों का ही पतन अग्निकांड के कारण हुआ है। आमरी, नाल और रानाघुंडई से न तो नारी मृण्मूर्ति और न ही पशु मृण्मूर्ति प्राप्त हुए हैं। नाल में उत्खनन कार्य एच. इरग्रीब्स (1925-26) के नेतृत्व में सम्पन्न हुआ तथा यहाँ से मकानों के अंदर फर्श पर शवाधान का साक्ष्य मिला है। रहमान की ढेरी से आरंभिक हड़प्पा काल में ही सुनियोजित बस्ती का साक्ष्य मिला है। यहाँ ध्यातव्य है कि क्वेटा और झोब घाटी (उत्तरी बलूचिस्तान) में हड़प्पाई स्थल नहीं मिले हैं।















