। ताम्रपाषाण काल (2000 ई.पू. से 500 ई.पू.)।
। Chalcolithic Age - 2000 BC to 500 BC। Part-4।

दक्षिण भारत
1. 2500 से 1800 ई.पू.- इस चरण में उत्नूर, कुपयाल, कौडेकाल, पालावाय, पिकलीहल और मास्की आदि स्थलों से खेतिहर समुदायों के साक्ष्य मिलते हैं।
2. 1800 से 1500 ई.पू.- इस चरण से सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, पिकलीहल, ब्रह्मगिरी, संगनाकालू, तैकलकोटा, हल्लूर और टीमरसिपुर आदि।
3. 1500 से 1100 या 1000 ई.पू.- इससे सम्बद्ध महत्त्वपूर्ण स्थल हैं, तेकल्लकोटा, हल्लूर, पिकलीहल, संगनाकालू, ब्रह्मगिरी और पय्यामपल्ली आदि।
→ दक्षिण भारत में इन ताम्रपाषाणकालीन स्थलों से राख के ढेर प्राप्त हुए हैं। सम्भवतः यह धार्मिक अनुष्ठान से संबद्ध था। दक्षिण भारत में ताम्रपाषाणकाल का अंत 1100/1000 ई.पू. में हुआ।
→ सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में लोहे का प्रयोग कमोवेश एक ही चरण में हुआ था। लगभग 1100/1000 ई.पू. में द. भारत में लोहे के उपकरणों का प्रयत्न प्रारम्भ हो गया। तत्पश्चात् दक्षिण भारत के इतिहास में महापाषाणकाल की शुरूआत हुई। इस महापाषाणकाल की सूचना हमें उनकी यथार्थ बस्तियों से कम तथा उनकी कब्रों से ज्यादा होती है। उसी प्रकार महत्वपूर्ण आवास स्थल एंव कब्रगाह निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं-कर्नाटक में ब्रह्मगिरी, मास्की, हल्लूर, जदिगेनहल्लि, आंध्रप्रदेश में नागार्जुनकोंड, चेल्लेस्वरम तथा पोचमपद, तमिलनाडु में अमृतमंगलम, सनुर तथा कुन्नुपुर और केरल में पोरमकालम महत्वपूर्ण हैं। महापाषाणकालीन शवों को दफनाने के भी तरीके देखने को मिलते हैं। इसी अधर पर भारत में मुख्यतः 4 प्रकार के महापाषणकालीन कब्रगाह देखे जाते हैं।
संगौरा वृत-
→ इसमें पहले शव को लोहे के औजारों मनिका पात्र या कलश और पालतू जानवरों की हड्डियों के साथ दफना दिया जाता था। तत्पश्चात् समाधि के चारों ओर गोल पत्थरों को जड़ दिया जाता था। इस प्रकार के संगोरा वृत नया कुंड बोरगाँव (महाराष्ट्र) तथा चिंगलपेट (तमिलनाडु) में मिलते हैं।
ताबूत-
→ यह भी अत्येष्टि की एक विधि है। इसमें पहले शव को दफनाकर चारों ओर से छोटे-छोटे पत्थरों के खम्भों से घेर दिया जाता था। फिर इन खम्भों के ऊपर एक बड़ी पत्थर की सिल्ली रखकर समाधि पर छाया-छत्र जैसी आकृति बना दी जाती थी। इस प्रकार की महापाषाणयुगीन समाधियाँ उत्तर प्रदेश के बाँदा एंव मिर्जापुर जिलों में मिलती हैं।
मैनहरि-
→ इस प्रकार की समाधियों में, शव को गाड़कर उसके ऊपर एक बड़ा-सा स्तम्भाकार स्मारक पत्थर लगा दिया जाता था तो उस स्थान पर समाधि होने का संकेत देता था। इस प्रकार की स्मारक समाधियाँ कर्नाटक के मस्की एंव गुलबर्गा क्षेत्रों में मिलती हैं।
महापाषाण तंब-
→ इस प्रकार की समाधियों के निर्माण में, सर्वप्रथम पत्थर की पट्टियों से घिरे हुए चबूतरे जैसे स्थान पर शव एक पत्थर की सिल्ली पर रखा जाता था। फिर शव के चारों कोनों पर स्थित खम्भों पर एक और पत्थर की पट्टी स्थित कर दी जाती थी। उपरोक्त बनावट मेज के आकार का आभास देती है। इसी कारण इस प्रकार की समाधियों को तंब कहा जाता है जिसका अर्थ है- पत्थर की मेज। इस प्रकार की समाधियाँ कर्नाटक में ब्रह्मगिरी एंव तमिलनाडु के चिंगलपेट नामक स्थान पर प्राय: देखी गयी हैं।
→ दक्षिण के इस महापाषाणकालिक संस्कृति के दो महत्वपूर्ण अभिवधण रहे, प्रथम लौह उपकरणों का प्रयोग तथा दूसरे काले एवं लाल मृदभांडों के प्रयोग से जुड़ा होना। महापाषाणकालिक लोग साधारणतया पहाड़ की ढलान पर रहते थे। अपने आवास के लिए वे नैसर्गिक तालाब या जलाशय के निकट पर्वतीय क्षेत्र का उपयोग करते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि उन लोगों ने सिंचाई की सहायता से धान की उपज प्रारंभ की किन्तु आरंभ में कृषि के लिए उपयोगी उपकरण, जैसे फावड़े, कुदाल, हँसुवा आदि की अपेक्षा युद्ध से संबंधित उपकरणों की संख्या ही अधिक है। अत: ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि महापाषाणकालिक लोग कृषि का विशेष विकास नहीं कर सके थे। महापाषाणकालिक लोग धान और रागी की खेती करते थे तथा मवेशी, भेड़ एवं बकरी पालते थे। आरंभ में ये सीमित भूमि का ही उपयोग करते थे परन्तु संभवतः प्रथम शती में अथवा इससे कुछ पहले ही उपजाऊ भूमि को कृषि के लिए उपयोग में लाने लगे थे।
→ महापाषाणकालिक संस्कृति से संबद्ध आवास स्थल एवं कब्रगाह दोनों प्रचुर संख्या में मिले हैं। इससे संबद्ध महत्वपूर्ण आवास स्थल दक्षिण भारत के निम्नलिखित क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं- कर्नाटक में ब्रह्मगिरी, मास्की, पिक्कीहल, संगनकल्ल, हालेंगती, हल्लर तथा टी. नरसीपूर, आंध्र प्रदेश में नागा, नागार्जुनकोंड, केसर पल्लि, येलेस्वरम, तमिलनाडु में पय्यमपल्लि कुनरत्तूर, तिरूक्कमपलपूर तथा उरैयुर। मृतक की आवश्यकता की सामग्री को भी इनके (कब्र के) साथ दफनाया जाता था। यहाँ के दो स्थलों- यथा, हल्लूर व पिक्कीहल से लोहे का साक्ष्य कब्रों से मिला है। इसमें देशी व विदेशी संस्कृति का मिश्रण है। चित्रकारी में घोड़े भी हैं। अत: इनका संबंध मध्य एशिया से रहा होगा। दक्षिण भारत में उस समय घोड़े नहीं थे।















