। ताम्रपाषाण काल (2000 ई.पू. से 500 ई.पू.)।
। Chalcolithic Age - 2000 BC to 500 BC। Part-1।

1. परवर्ती हड़प्पा स्थल जो अपनी प्रकृति में ताम्रपाषाणकालिक ही थे।
2. अन्य ताम्रपाषाण कालीन संस्कृतियाँ।
→ इसके अलावा कुछ अन्य संस्कृतियाँ हैं जैसे उदाहरण के लिए चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति तथा उत्तरी काले पालिशदार मृदभांड संस्कृति। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् भारतीय उपमहाद्वीप में कतिपय संस्कृतियाँ अस्तित्व में आई। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् क्रमबद्ध नगर योजना, पक्के ईंटों का प्रयोग, लेखन कला, मानक माप व तौल की प्रणाली आदि संस्कृतियां आई परन्तु संभवत: इनका एक सकारात्मक प्रभाव था, ग्रामीण क्षेत्रों में धातु तकनीकी का प्रसार। सिन्धु सभ्यता के पतन के पश्चात् कुछ ऐसी ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ अस्तित्व में आई जिन पर सिन्धु सभ्यता का प्रभाव देखा जा सकता है। इन्हें परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के नाम से जाना जाता है। इस संस्कृति के अंतर्गत कुछ महत्त्वपूर्ण संस्कृतियाँ इस प्रकार हैं- सिंध में झूकर संस्कृति, पंजाब एंव वहावलपुर में कब्रगाह ‘एच' संस्कृति, गुजरात में लाल-चमकीले मृदभांड संस्कृति, गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र में गैरिक मृदभांड संस्कृति।
ताम्रपाषाणकालीन कृषि संस्कृति
→ धातु काल के मनुष्यों के सामाजिक जीवन में पहले की अपेक्षा कुछ सुधार अवश्य हुआ होगा। इस संस्कृति के अंतर्गत तांबे एवं पत्थरों के उपकरणों का प्रयोग साथ-साथ होता था। यद्यपि सीमित रूप में निम्न गुणवत्ता से युक्त कांसे का भी प्रयोग होता था। कुछ ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ द.पू. राजस्थान, मध्य प्रदेश के पश्चिमी भाग एवं पश्चिमी महाराष्ट्र में स्थापित हुई। इसके अलावा कुछ बस्तियाँ पूर्वी भारत व दक्षिणी भारत में भी स्थापित हुई। इन ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियों की निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं-
→ चित्रित बर्तनों का प्रयोग जो मुख्यत: लाल पर काले रंगों से रंगे थे।
→ सिल्कामय पत्थरों के ब्लेड व पत्थरों का अत्यधिक विकसित उद्योग।
→ दक्षिण पूर्व राजस्थान में अहार या बनास संस्कृति का विकास हुआ। इसका विकास बनास की घाटी में हुआ। इसका प्रारूप स्थल अहार था। यद्यपि गिलुद भी इसी से सम्बद्ध है। गिलुद से ही पकाये गए ईंटों का साक्ष्य प्राप्त होता है, जो लगभग 1500 ई.पू. से सम्बद्ध है। अहार से हमें लघुपाषाण उपकरण प्राप्त नहीं होते है, केवल तांबे के उपकरण ही मिले हैं। अहार को ताम्रवती भी कहा गया है। अहार में बने हुए मकान लकड़ी व कच्ची मिट्टी के बदले, पत्थरों के मिले हैं। इस संस्कृति का काल 2400 से 1400 ई.पू. है।
→ पश्चिम मध्यप्रदेश में मालवा संस्कृति का विकास हुआ। इससे पूर्व कायथा संस्कृति का भी विकास हो चुका था। इसका काल 2000 ई.पू. से 1800 ई.पू. था, जबकि मालवा का 1700 से 1200 ई.पू.। मालवा संस्कृति का मूल क्षेत्र मालवा, कायथा व एरण है। मालवा संस्कृति अपनी मृदभांडो की उत्कृष्टता के लिए जानी जाती है। आगे मालवा संस्कृति का प्रसार महाराष्ट्र क्षेत्र में भी हुआ।
→ ताप्ती नदी की घाटी में (2000-1800 ई.पू.) स्वाल्दा तथा महाराष्ट्र में जोरवे संस्कृति का विकास हुआ। जोरवे संस्कृति का मुख्य क्षेत्र जोरवे, नेवासा, दैमाबाद, इनामगांव, प्रकाश, नासिक और चंदोली इत्यादि थे। इसका काल 1400 ई.पू. से 700 ई.पू. तक माना जाता है। जोरवे संस्कृति के अंतर्गत घरों की बनावट वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार होती थी। दीवारें मिट्टी या गारे को मिलाकर बनाई जाती थीं। दैमाबाद में प्राप्त तांबे की चार वस्तुएँ हैं- रथ चलाता मनुष्य, सांड, गैडा एवं हाथी। जोरवे संस्कृति का सबसे बड़ा स्थल दैमाबाद ही है। यहाँ से चार संस्कृतियों के स्तर प्राप्त हुए हैं। सबसे बड़ा उत्खनित ग्रामीण स्थल नवदाटोली है। सर्वाधिक फसलों की संख्या नवदाटोली से प्राप्त हुई है।
→ पूर्वी भारत में बिहार में चिरंद, सेनुआर, सोनपुर व तारादीह में ताम्रपाषाणकालीन स्थल मिले हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में खैराडीह व नरहन में ताम्रपाषाणकालीन स्थल मिले हैं। उसी तरह बंगाल में पांडू, रजार, ढीबी तथा महीषादल में ताम्रपाषाणकालीन स्थल प्राप्त हुए हैं।















