Ancient History । Chapter-4 P-2


नवपाषाण काल

Neolithic Period। Part-2



  दक्षिण भारत में कुछ नवपाषाण स्थल निम्न हैं, कर्नाटक में मस्की, ब्रह्मगिरि, हल्लूर, कोडक्कल, पिकलीहल, संगेनकलन, तेकलकोट्टा तथा तमिलनाडु में पय्यमपल्ली और आध्रप्रदेश में उत्नूर।


मेहरगढ़- 

  वर्तमान पाकिस्तान में स्थित इस स्थल के उत्खनन से तीन सांस्कृतिक कारण इस स्थल को नवपाषाण कालीन मेहरगढ़ कहा गया। यह भारतीय उपमहाद्वीप की प्राचीनतम कृषक बस्ती थी और यहाँ 6000 .पू. के लगभग कृषि का साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से गेहूँ, जौ और मसूर की खेती का साक्ष्य मिला है।


चौपानी मांडो- 

  बेलनघाटी क्षेत्र में स्थित कोल्डीहवा से नवपाषाणिक और मांडो से विश्व का प्राचीनतम मृदभांड 7000 .पू. के लगभग प्राप्त हुआ है। यह नवपाषाण काल की तिथि को कुछ पीछे ले जाता है।


महगढ़ा- 

  बेलनघाटी क्षेत्र में स्थित इस स्थल से पशुपालन का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। यहाँ से पशुओं का विशाल बाड़ा मिला है जिसमें तीन बहुत बड़े दरवाजे हैं तथा 28 स्तंभगर्त्त। इसमें बीस से अधिक पशु बाँधे जाते रहे होंगे।


चिराँद- 

  बिहार के छपरा जिला में स्थित यह स्थल नवपाषाण काल और ताम्रपाषाणिक संस्कृति के तीसरे चरण से संबद्ध है। इसका काल-निर्धारण (2500-1400 .पू.) किया गया है। कालखण्ड और अस्थि-उपकरण की दृष्टि से इसका बुर्जहोम से साम्य है। यहाँ से पाषाण और पशु-श्रृंगों से निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह उत्तम कृषक बस्ती थी जहाँ से गेहूँ, जौ और धान की खेती के प्रमाण मिले हैं।


डेओजली हेडिंग- 

  यह स्थल मेघालय में स्थित है। यहाँ से तथा मेघालय के अन्य स्थलों-सरूतरू एंव मइक डोला और असम से ढ़लवे जगह पर मकान बनाने के प्रयास किये जाने का संकेत मिलता है। यहाँ से झूम की खेती का प्राचीनतम प्रमाण मिला है। यहीं ढलवे जगह पर खेती प्रारंभ हुई थी।


ब्रझगिरि- 

  इस जगह पर उत्खनन 1947 में मार्टिमर ह्वीलर (Martimer wheeler) के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ। यह स्थल तीन सांस्कृतिक चरणों से सम्बद्ध है- नवपाषाण काल, मध्य पाषाण काल और आंध्र-सातवाहन चरण। यहाँ से 1500 .पू. के लगभग रागी और कुल्थी की खेती का प्राचीनतम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से कलश शवाधान के साथ-साथ इस बात का साक्ष्य भी प्राप्त हुआ है कि छोटे बच्चे को आवासीय स्थल में या उसके करीब दफनाया जाता था।


उत्नूर और पय्यमपल्ली- 

  उत्नूर आंध्र प्रदेश में स्थित है और पय्यमपल्ली तमिलनाडु में। दोनों जगह से कपड़े के निर्माण और कपड़े के उपयोग का प्रथम साक्ष्य प्राप्त हुआ है। यहाँ से हड्डी का बना हुआ सूआ मिला है जो वस्त्र निर्माण में उपयोगी था।


नागार्जुनकोंडा- 

  आंध्र प्रदेश में स्थित नागार्जुनकोंडा बुर्जहोम और गुफक्कराल के अतिरिक्त गर्त्तनिवास का साक्ष्य एकमात्र स्थल है। यह स्थल भी ब्रह्मगिरि (1500 .पू.) का समकालीन था और इसी समय में यहाँ रागी और कुल्थी की खेती की जाती थी। ब्रह्मगिरि की तरह यहाँ भी छोटे बच्चे को आवासीय स्थल या उसके करीब दफनाने का साक्ष्य मिला है। यहाँ से मालवाहक पशुओं यथा घोड़ा, गधा, खच्चर का प्रमाण भी मिला है।

  दक्षिण भारत में प्रयुक्त होने वाली पहली फसल रागी थी। नवपाषाण काल में कृषि यहाँ गौण ही थी। दक्षिण भारत में नवपाषाण 2000 .पू. से 1000 .पू. तक जारी रही। नवपाषाण काल में कृषि उपकरण में खन्ती एवं कुदाल का प्रयोग होता था।

  ताम्रपाषाण काल में कृषि कार्य पूर्णत: स्थापित हो गया। ताम्रपाषाण एवं सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों में पत्थर के उपकरणों का ही अधिक प्रयोग हुआ। ताम्रपाषाण काल तकनीकी दृष्टि से काँस्ययुग से प्राचीन है परन्तु कुछ ताम्रपाषाणकालिक स्थल काँस्ययुग से प्राचीन थे, कुछ उसके समकालीन थे एवं कुछ परवर्ती थे।