
संविधान की पाँचवी और छठवीं अनुसूची में जनजातियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले प्रावधान सम्मिलित किये गए हैं। इन प्रावधानों के अतिरिक्त कुछ अन्य प्रयासों के बावज़ूद भी जनजातियों की स्थिति समाज के अन्य समुदायों की तुलना में काफी कमतर रही है। विकास के सभी संकेतकों, जैसे-शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, जीवन-प्रत्याशा व शिशु मृत्यु दर आदि सभी में ये जनजातियाँ राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं। इसके पीछे निम्नलिखित कारण हो सकते हैं –
→ स्वतंत्रता के बाद विकास कार्यों के नाम पर अब तक लगभग 5 करोड़ एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया है। इस अधिग्रहण से प्रभावित लोगों में सर्वाधिक संख्या इन्हीं जनजातीय लोगों की रही है। पुनर्वास और आजीविका के साधन उपलब्ध कराने के सरकारी प्रयासों में व्याप्त खामियों के चलते इन समुदायों के लिये अपना अस्तित्व बचाना कठिन हो गया।
→ आधुनिक अर्थतंत्र में जनजातियाँ नई आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय संस्थाओं का लाभ उठाने की लिये पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं थीं, अतः दूसरे समुदायों के समक्ष वे प्रतियोगिता में नहीं टिक पाईं।
→ जहाँ उत्तर-पूर्व के जनजातीय क्षेत्रों में उग्रवाद पनपा, वहीं पाँचवी अनुसूची में आने वाले कुछ राज्यों में नक्सलवाद ने जड़ें जमा लीं। इन्हें एक सामाजिक-आर्थिक समस्या न मानकर कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर सुलझाने का प्रयास किया गया।
→ पारंपरिक कृषि और वनोपज ही इन जनजातियों की अर्थव्यवस्था का मूल आधार है। नई आर्थिक नीतियों में जब कृषि की ही उपेक्षा होती रही, तो परंपरागत कृषि का अस्तित्व तो खतरे में पड़ना ही था।
→ स्वतंत्रता के बाद से प्रचलित शिक्षा पद्धति का माध्यम और पाठ्यक्रम दोनों ही इन जनजातियों की सभ्यता और संस्कृति की उपेक्षा पर आधारित रहा है।
→ इन समुदायों के कुछ लोगों को राजनीति में प्रवेश के माध्यम से इन जनजातियों के प्रतिनिधित्व का अवसर मिला, परंतु इन्होंने ने भी अपने स्वार्थ के चलते जनजातियों की समस्याओं को यथावत् रहने दिया, ताकि उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिये कभी मुद्दों का अभाव ना रहे।
→ यदि वास्तव में जनजातियों की समस्याओं का समाधान करना हो, तो नेहरू द्वारा सुझाए “जनजातीय-पंचशील” के सिद्धांतों का पालन करना होगा। आधुनिक तथाकथित विकास को उन पर थोपने की बजाए उन्हें उनकी इच्छा और विशेषता के अनुसार विकास के मार्ग पर बढ़ने देना चाहिये।















