GS Paper-2 Indian Polity (राजव्यवस्था) Part-1 (Q.38)

GS PAPER-2 (भारतीय राजनीति) Q-38
 
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Q.38 - देश में राजनीतिक फंडिंग प्रणाली में सुधार लाने और नकदी रहित अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाने के उद्देश्य से लाए गए चुनावी बॉण्ड योजना के उद्देश्यों, विशेषताओं और कमियों को स्पष्ट करें।
उत्तर :
भूमिका में:
चुनावी बॉण्ड योजना लाने के पीछे के उद्देश्य -
       देश में राजनीतिक फंडिग प्रणाली में सुधार लाने और नकदी रहित अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाने के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान सरकार ने चुनावी बॉण्ड योजना की शुरूआत की थी। 2017 के आम बजट के दौरान घोषित की गई इस योजना का लक्ष्य सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे का ब्यौरा रखना है
विषय-वस्तु में:

चुनावी बॉण्ड के बारे में विस्तार से -
  चुनावी बॉण्ड एक ऋण सुरक्षा है जिसका जिक्र 2017 के आम बजट में किया गया था। इसके अनुसार RBI एक प्रकार का बॉण्ड जारी करेगा और राजनीतिक पार्टियों को दान देने का इच्छुक व्यक्ति पहले बैंक से बॉण्ड खरीदेगा और दान के रूप में वह बॉण्ड राजनीतिक दल की दे दिया जाएगा।
  राजनैतिक दल इस चुनावी बॉण्ड की बिक्री अधिकृत बैंक को करेगे और वैधता अवधि के दौरान राजनैतिक दलों के बैंक खातों में बॉण्ड के खरीद के अनुपात में राशि जमा करा दी जाएगी। यह एक प्रॉमिसरी नोट की तरह है जिस पर किसी भी तरह का ब्याज नहीं दिया जाएगा। चुनावी बॉण्ड को चेक या -भुगतान के जरिये ही खरीदा जा सकता है।
चुनावी बॉण्ड लाने के पीछे का उद्देश्य
  राजनीतिक फंडिंग की पारंपरिक प्रणाली दान पर निर्भर करती है जोकि बड़े या छोटे दान के रूप मे राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं, समर्थकों, छोटे व्यवसायियों और यहाँ तक कि बड़े उद्योगपतियों जैसे स्त्रोतों की एक व्यापक श्रृंखला से आते है।
  जब चंदे की राशि नगदी में दी जाती है तो धन के स्त्रोत के बारे में, यानी दानकर्त्ता के बारें तथा यह धन कहाँ खर्च किया गया, इसकी भी कोई जानकारी नही मिलती।
  चुनावी बॉण्ड का उद्देश्य राजनीतिक दलों को दिये जाने वाले नकद गुप्त चंदे के चलन को रोकना है।
  इससे वर्तमान प्रणाली में पारदर्शिता आएगी। एक ओर बैंक इस बात से अवगत होगा कि कोई चुनावी बॉड किसने खरीदा और दूसरी तरफ, बॉण्ड खरीदने वाले को उसका उल्लेख अपनी बैलेंस शीट मे भी करना होगा।
  दानकर्त्ता ये बॉण्ड SBI की शाखाओं से खरीदकर किसी भी दल को दान कर सकेंगे। दानकर्ता चुनाव आयोग में पंजीकृत उसी राजनीतिक दल को इन्हे दान में दे सकते हैं, जिन दलों ने पिछले चुनावों में कुल मतों का कम-से-कम 1 प्रतिशत हासिल किया है।
  बॉण्ड से मिलने वाली चंदे की राशि संबंधित दल के अधिकृत बैंक खाते में जमा होगी। इलेक्टोरल बॉण्ड की वैधता सिर्फ 15 दिनों की होगी। बॉण्ड को कम अवधि के लिये वैध रखे जाने का उद्देश्य इसके दुरूपयोग को रोकना एवं साथ ही राजनीतिक दलों को वित्त उपलब्ध करानें में कालेधन के उपयोग पर अंकुश लगाना है।
चुनावी बॉण्ड की कमियों को बतांए-
  चूँकि पार्टियों के व्यय की कोई सीमा तय नही होती और चुनाव आयोग इसकी निगरानी नहीं कर सकता है। अंत: यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि आने वाली राशि काला धन है या सपेद, क्योकि दाता गोपनीय है।
  आर्थिक रूप से कंगाल हो रही कंपनी से पैसा या विदेशी धन भी दान के रूप में सकता है।
  यह योजना दाता को पूरी गुमनामी की सुविधा प्रदान करती है और तो बॉण्ड के खरीददार और ही दान प्राप्त करने वाली राजनैतिक पार्टी की पहचान का खुलासा करने को बाध्य हैं।
  इस प्रकार किसी कंपनी के शेयरधारक अपनी कंपनी द्वारा दिये जाने वाले दान से अनजान होंगे और साथ ही मतदाताओं को यह भी नही पता होगा कि राजनीतिक पार्टी को किस प्रकार और किसके माध्यम से फंडिंग मिली है।
  इसके अलावा, किसी दानकर्त्ता कंपनी को दान देने से कम-से-कम तीन साल पहले अस्तिव में होने, की पूर्व शर्त को भी हटा दिया गया है। यह शर्त शेल कंपनियों के माध्यम से काले धन को राजनीतिक में खाने से रोकती है।
निष्कर्ष
       यह एक सार्थक कदम है कि राजनैतिक दलों को दी जाने वाली संदिग्ध नगदी के बजाय चुनावी बॉण्ड प्रदान किया जाए। हालाँकि, यह कदम सुधार की तरफ उठाया गया एक छोटा, ज़िम्मेदार और पारदर्शी कदम साबित होगा। ऐसा कोई भी कदम जो तंत्र को ज़्यादा पारदर्शी, ज़िम्मेदारपूर्ण, खुला एवं लोकतांत्रिक बनाए, उसका स्वागत किया जाना चाहिये। ऐसी किसी भी पहल के सफल कार्यान्वयन के बाद ही उसके संबंध में आने वाली समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिये।

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