
भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ और स्वतंत्रता के इस संघर्ष में लोगों ने भागीदारी की एवं समग्र रूप से योगदान किया। इस प्रक्रिया में उत्तर-पूर्वी राज्यों ने अपनी पूरी सामर्थ्य से सहयोग किया। ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह की शुरुआत करने में उत्तर-पूर्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने अंततः अंग्रेज़ों को हमारी मातृभूमि छोड़ने के लिये बाध्य किया। इस क्षेत्र के योगदान को प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों की उपलब्धियों के माध्यम से समझा जा सकता है।
→ यू टिरोट सिंह- वर्तमान मेघालय के इस सेनानी ने जनजातियों एवं समुदायों की एकता के लिये प्रयास किया तथा 3 वर्षों तक ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष किया। बाद में उन्हें ढाका में कैद कर लिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई।
→ रानी गैडिनलियू- स्वतंत्रता संग्राम में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने अंग्रेज़ों की दमनकारी नीतियों का खुलकर विरोध किया और विरोधस्वरूप ‘जेलियागांग’ लोगों को कर देने से मना किया। उन्होंने 13 वर्ष की उम्र में अंग्रेज़ों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। 16 वर्ष की उम्र (1932 ई.) में उन्हें जेल में डाल दिया गया जो स्वतंत्रता के बाद रिहा हुईं।
→ कनक लता बरुआ- ये असमी स्वतंत्रता सेनानी थीं तथा ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से सम्बद्ध थीं। 1942 के आंदोलन में जब ये शान से राष्ट्रीय झंडा थामे हुई थीं तो अंग्रेज़ों ने उन्हें गोली मारकर मौत की नींद सुला दिया।
→ उपरोक्त सेनानियों के अलावा उत्तर-पूर्व के कई अन्य लोगों ने भी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में समान योगदान किया। इनमें से कुछ के नाम हैं: बीर टिकेन्द्र जीत सिंह, कुशल कुँवर, गोम्बधन कुँवर एवं पियाली फूकन।
→ इस तरह, इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में पूर्वोत्तर भारत का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।















