
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार समस्त पृथ्वी पर विवर्तनिकी शक्तियाँ काम कर रही हैं जिनके प्रभावाधीन भू-पर्पटी का ऊपरी भाग नर्म दुर्बलतामंडल पर भ्रमण कर रहा है। प्लेट शब्द का प्रयोग सबसे पहले कनाडा के विख्यात भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन ने सन् 1955 में किया था।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत की निम्नलिखित तीन आधारभूत कल्पनाएँ हैं:
→ समुद्र अधस्तल का विस्तारण होता है। महासागरीय अधस्तलों के मध्य में स्थित कटक लावा निष्कासन में सक्रिय हैं। मध्यवर्ती महासागरीय कटक महासागर के अधस्तल पर स्थित दरारें हैं, जहाँ से पिघले शैल बाहर निकल कर नवीन भू-पर्पटी का निर्माण कर रहे हैं। कटकों से बाहर की ओर भू-पर्पटी का विस्तार हो जाता है और महासागरीय द्रोणी चौड़ी हो जाती है।
→ पिछले लगभग 60 करोड़ वर्षों से पृथ्वी का क्षेत्रफल लगभग समान रहा है और इसके अर्धव्यास में 5% से अधिक की वृद्धि नहीं हुई है। दूसरे शब्दों में भू-पटल का नष्ट हुआ क्षेत्रफल निर्मित क्षेत्रफल के बराबर होता है।
→ भू-पटल का नवनिर्मित भाग प्लेट का अभिन्न अंग बन जाता है। नवनिर्मित भाग महाद्वीपीय या महासागरीय कोई भी हो सकता है।















