Ancient History । Series-2 P-2


प्रागैतिहासिक काल

Prehistoric Era। Part-2



2. मध्य पुरापाषाण काल

  इस काल की महत्त्वपूर्ण विशेषता थी, प्रयुक्त होने वाले कच्चे माल में परिवर्तन। पुरापाषाण काल में क्वार्टजाइट प्रमुख कच्चा माल था जबकि मध्य पुरापाषाण काल में जेस्पर, चर्ट आदि का प्रयोग प्रमुख कच्चे माल के रूप में होने लगा। इस काल में क्रोड उपकरणों की प्रधानता लुप्त हो गई जबकि शल्क विनिर्माण का प्रचलन बढ़ता गया। मध्य पुरापाषाण काल के स्थल प्राय: सम्पूर्ण देश में बिखरे हुए हैं। हालांकि उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में उतने स्थल प्राप्त नहीं होते जितने प्रायद्वीपीय क्षेत्र में प्राप्त हुए हैं। इसका मुख्य कारण पंजाब में उपयुक्त कच्चे माल का अभाव। नेवास (गोदावरी नदी के तट पर) मध्य पुरापाषाण काल की संस्कृति का प्रारूप स्थल है। एच.डी. संकालिया ने इसे प्रारूप स्थल घोषित किया है। इस काल में हमें काटने के औजारों की (Chopper) प्रधानता मिलती है। इस काल में पाए जाने वाले उपकरणों मेंचापर', ‘ब्लेड', बेधक, ‘व्यूरिन', चान्द्रिक, ‘स्क्रपर' तथा 'छिद्रक' आदि हैं।


3. उच्च पुरापाषाण काल

  इस काल में नमी कम हो गई। इस अवस्था का विस्तार हिमयुग की उस अंतिम अवस्था के साथ रहा जब जलवायु अपेक्षाकृत गर्म हो गयी। इस काल की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  इसमें उपकरण बनाने की मुख्य सामग्री लम्बे स्थूल प्रस्तर फलक होते थे।

  इस काल के उपकरणों में तक्षणी और खुरचनी उपकरणों की प्रधानता बढ़ती गयी।

  इस काल में अस्थि (हड्डी) उपकरणों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण हो गयी।

  इस काल में नक्काशी और चित्रकारी दोनों रूपों में कला का विकास हुआ। विंध्य क्षेत्र में स्थित भीमबेटका में विभिन्न कालों की चित्रकारी देखने को मिलती है। प्रथम काल में उत्तर पुरापाषाण काल की चित्रकारी में हरे गहरे लाल रंग का उपयोग हुआ है।


सोहन नदी घाटी- 

  शिवालिक के सामने सोहन नदी घाटी से निम्न पुरापाषाण कालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। यहाँ 1931-32 के बीच येल कैंब्रिज अभियान दल  के डी. टेरा और पैटर्सन के नेतृत्व में उत्खनन प्रारंभ हुआ, यहाँ से प्राप्त उपकरण फ्लेक तकनीक से बनाए गए। भारत में सबसे पुराने हस्त कुठार, गडाँसा, खंडक की प्राप्ति इस क्षेत्र से हुई है। यहाँ से फलक उद्योग का प्रमाण मिलता है।


भीमबेटका- 

  मध्य प्रदेश के रायसन जिले में स्थित इस पहाड़ी से मनुष्य के गुफावास का प्रमाण मिलता है। यहाँ से प्राप्त 500 गुफा चित्रों में 5 गुफा चित्र पुरापाषाण काल के तथा शेष चित्र मध्यपाषाण काल के हैं। इन गुफा चित्रों की महत्ता को प्रकाश में लाने का श्रेय श्री वाकणकर महोदय को जाता है। भीमबेटका से नीले रंग के कुछ पाषाण-खण्ड मिले हैं। वाकणकर महोदय के अनुसार, इनके द्वारा चित्रकारी के लिए रंग तैयार किया जाता था।


इथनौरा- 

  नर्मदा घाटी क्षेत्र में स्थित यह स्थल मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित है। यह उपरी पुरा पाषाणकालीन स्थल है जिसकी खोज 1987 में की गई। इसी स्थल से भारतीय उपमहाद्वीप में सर्वप्रथम मानव खोपड़ी की प्राप्ति हुई है जो होमो इरैक्टस समूह से संबंधित है। इससे पूर्व भारतीय उपमहाद्वीप में कहीं भी पुरापाषाण कालीन मनुष्य का अवशेष नहीं प्राप्त हुआ है। यहाँ पशुओं के जीवाश्म के रूप में हाथी की दो प्रजातियाँ भी प्राप्त हुई हैं।


बेलनघाटी क्षेत्र- 

  उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर और इसके समीपवर्ती क्षेत्रों में विस्तृत बेलनघाटी क्षेत्र में पाषाणयुगीन 44 क्षेत्रों की खोज की गई है। यह भारतीय उपमहाद्वीप का एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ से तीनों चरणों के प्रमाण मिले हैं। यहाँ से पाषाण युग के क्रमिक विकास को बताया जा सकता है।


लोंहदाबाद क्षेत्र- 

  यह क्षेत्र ऊपरी पुरापाषाण कालीन स्थल है। यहाँ से 30,000 .पू. की मूर्ति प्राप्त हुई है। इस पर विवाद है कि यह मूर्ति है या उपकरण। फिलहाल इसे उपकरण माना गया है।


बोरी- 

  महाराष्ट्र के पुणे में स्थित इस पुरापाषाण कालीन स्थल की खोज 1988 में की गई। इस क्षेत्र में ज्वालामुखी उद्गार स्तरों की प्राप्ति हुई है और इन दोनों स्तरों से उपकरणों की प्राप्ति हुई। यहाँ से भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे पुराने उपकरण की प्राप्ति हुई है। यह क्षेत्र पुरा पाषाण काल को लगभग 12 लाख वर्ष पूर्व ले जाता है।


अतिरमपक्कम 

  मद्रास के निकट स्थित अतिरमपक्कम निम्न पुरापाषाणिक स्थल है। सोहन घाटी की तरह यहाँ से भी निम्न पुरापाषाणकाल का तकनीकी विकासक्रम प्राप्त होता है। लेकिन सोहन घाटी के उपकरण फ्लेक निर्माण विधि से बनाए जाते थे, जबकि अतिरमपक्कम के उपकरण कोर निर्माण तकनीक से। यहाँ उपकरण एचूंलियन टाइप या एवीविले टाइप के होते हैं।


पल्लवरम- 

  मद्रास के निकट स्थित पल्लवरम भारत का सबसे पहला स्थल है जहाँ से पाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह भारत में खोजा गया, पहला पुरा पाषाण-कालीन स्थल है। 1867 में राबर्ट बूस फूट और ओल्ड हेम को यहाँ से हस्तकुठार की प्राप्ति हुई है।


मच्छुतावी-चिन्तामनुगावी पहाड़ी- 

  आंध्रप्रदेश में स्थित कुरनूल प्राचीनतम पुरापाषाण कालीन स्थल है। यहाँ से प्राप्त उपकरण क्वार्टजाइट, कैल्सेडोनी, सैडस्टोन, फ्लिट और चर्ट से बने हैं। फ्लिट और चर्ट मिलने से इस धारणा का खण्डन हुआ है कि निम्न पुरापाषाण कालीन मनुष्य फ्लिट और चर्ट का प्रयोग नहीं करते थे। यहाँ से पशुओं के हड्डी के उपकरण प्राप्त हुए हैं। यह कई पुरानी धारणाओं का खण्डन करता है। छनी प्रस्तर भी सर्वप्रथम यहीं से प्राप्त हुआ है।