GS Paper-2 Govt. Administration (शासन व्यवस्था) Q.47

GS PAPER-2 (शासन व्यवस्था) Q-47
{Government Administration}


जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019
चर्चा में क्यों?
      हाल ही में राज्यसभा द्वारा जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक, 2019 [Jallianwala Bagh National Memorial (Amendment) Bill, 2019] पारित किया गया है।
मुख्य बिंदु:
  इस विधेयक को लोकसभा द्वारा 2 अगस्त, 2019 को पारित कर दिया गया था, अतः यह विधेयक अब संसद द्वारा पारित हो गया है।
  वर्ष 2019 में जलियाँवाला बाग हत्याकांड की 100वीं बरसी है।
  इस घटना के 100 साल बीत जाने के बाद यह आवश्यक है कि जलियाँवाला बाग स्मारक को राष्‍ट्रीय स्‍मारक के रूप में स्थापित किया जाए।
  यह विधेयक जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 में संशोधन का प्रावधान करता है।
विधेयक में प्रावधान:
जलियाँवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक अधिनियम, 1951 के अनुसार इस स्मारक के न्यासियों में निम्नलिखित शामिल हैं-
  अध्यक्ष के रूप में प्रधानमंत्री
  भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष
  संस्कृति मंत्रालय का प्रभारी मंत्री
  लोकसभा में विपक्ष का नेता
  पंजाब का राज्यपाल
  पंजाब का मुख्यमंत्री
  केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन प्रतिष्ठित व्यक्ति
      इस विधेयक में भारतीय राष्‍ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्‍यक्ष को न्‍यास का स्थायी सदस्य बनाए जाने से संबंधित धारा को हटाकर गैर राजनीतिक व्यक्ति को इसके संचालन हेतु न्‍यासी बनाने का प्रयास किया गया है।
  विधेयक में यह संशोधन भी किया गया है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अथवा विपक्ष का ऐसा कोई नेता न होने की स्थिति में सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को न्‍यास के सदस्य के रूप में शामिल किया जाए।
  इस विधेयक के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा नामित तीन न्यासियों को पाँच वर्ष की अवधि के लिये नियुक्त किया जाएगा तथा इन्हें पुनः नामित भी किया जा सकता है।
  इस विधेयक में यह संशोधन भी किया गया है कि नामित न्‍यासी को पाँच साल की अवधि समाप्त होने से पहले भी केंद्र सरकार द्वारा हटाया जा सकता है।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड
  9 अप्रैल, 1919 को (कुछ स्रोतों में 10 अप्रैल भी) रोलैट एक्ट का विरोध करने के आरोप में पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉ. सत्यपाल एवं डॉ. सैफुद्दीन किचलू को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया।
  इनकी गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल, 1919 को बैशाखी के दिन अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया।
  जनरल डायर ने इसे अपने आदेश की अवहेलना माना तथा सभास्थल पर पहुँचकर निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया।
  आंकड़ों के अनुसार, मरने वालों की संख्या 379 थी लेकिन वास्तव में इससे कहीं ज्यादा लोग मारे गए थे।
  इस नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदान की गई नाइटहुडकी उपाधि त्याग दी।
  इस हत्याकांड की जाँच के लिये कॉन्ग्रेस ने मदन मोहन मालवीय की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की।
  ब्रिटिश सरकार ने इस हत्याकांड की जाँच के लिये हंटर आयोग गठित किया।


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