Ancient History । Chapter-8 P-1


सिन्धु सभ्यता के प्रमुख स्थल

Prominent Places of the Indus Valley Civilization। Part-1



हड़प्पा

  हड़प्पा रावी नदी के किनारे पंजाब के माँटगोमरी जिले में स्थित है। इसकी खुदाई दयाराम साहनी के नेतृत्व में (माधोस्वरूप वत्स सहायक) 1921 . में हुई। यह शहर विभाजित है, पश्चिमी में गढ़ी है और पूर्वी भाग में निचला शहर है। हड़प्पा में :-: के दो कतारों में धान्य कोठार मिले हैं। अनाजों के दाबने के लिए एक चबूतरा बना था।

  इसमें जौ एवं गेहूँ के दाने मिले हैं। दो कतारों में 15 मकान मिले हैं। इनकी पहचान श्रमिक आवास के रूप में हुई है। . क्षेत्र में एक (सेमेट्री) कब्रिस्तान आर-37 है। हड़प्पा से एक मूर्ति धोती पहने प्राप्त हुई है। यहाँ बालू पत्थर की दो मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। इनसे शरीर संरचना का ज्ञान मिलता है। एक बरतन पर मछुआरे का चित्र बना मिला है। शंख का बना हुआ एक बैल भी मिला है। यहाँ से बना कांसा का एक्का प्राप्त हुआ है। कांस्य दर्पण भी यहाँ से प्राप्त हुए हैं। सिन्धु सभ्यता की अभिलेखयुक्त मुहरें सर्वाधिक हड़प्पा से ही प्राप्त हुई हैं।


मोहनजोदड़ो

  यह सिन्ध के लरकाना जिले में स्थित है। यह सिंधु नदी के किनारे अवस्थित है। इसका अर्थ है-मृतकों का टीला। 1922 . में इसकी खुदाई राखालदास बैनर्जी के निर्देशन में करायी गई। यहाँ से एक सभागार (एसेम्बली हाल), पुरोहितों का आवास, महाविद्यालय एवं महास्नानागार के प्रमाण मिले हैं। यहाँ सूती कपड़े का साक्ष्य मिला है।

  मोहनजोदड़ो में 16 मकानों का बैरक मिला है। एक बरैक को मैके ने दुकान कहा है जबकि पिगॉट महोदय ने इन्हें कुली लाइन कहा है। काँसे की एक नग्न नर्तकी की मूर्ति मिली है। यहीं से एक दाढ़ी वाले साधु की मूर्ति प्राप्त हुई है। पशुपति शिव का साक्ष्य भी यहीं मिला है। यहीं कुम्हार के : भट्ठों (चिमनी) के अवशेष मिले हैं। हाथी का कपाल खंड मिला है। यहां गले हुए ताँबे का ढेर मिला है। यहाँ से वाट मिला है, जो सेलखड़ी का बना था। राणाघुडई के निम्न धरातल से घोडे के दांत के अवशेष मिले हैं।


चांहुदड़ो (सिन्ध)

  एन.जी. मजुमदार के प्रयास से 1931 में इसकी खोज हुई। 1935 में मैके ने इस कार्य को आगे बढ़ाया। यह स्थल सिंध में मोहनजोदड़ो 130 कि.मी. दक्षिण में स्थित है। यहाँ से मनके बनाने का एक कारखाना प्राप्त हुआ है। उत्तर-हड़प्पा (झूकर एवं झांगर संस्कृति) संस्कृति इस स्थल पर विकसित हुई। इस स्थल पर बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते का साक्ष्य मिला है। सौंदर्य प्रसाधन में लिपस्टिक का प्रमाण मिला है। चांहुदड़ो एकमात्र ऐसा स्थल है जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं।


लोथल

  यह गुजरात के अहमदाबाद जिले में पड़ता है। यह भोगवा नदी के किनारे अवस्थित है। 1957 में इसकी खोज रंगनाथ राव ने की। इस स्थल का आकार आयताकार है। लोथल के पूर्वी भाग में गोदीवाड़ा (डॉकयार्ड) का साक्ष्य मिला है। यह 214 मीटर × गहराई 3.3 मीटर का है। लोथल में दुर्ग एवं निचले शहर के बीच विभाजन नहीं है। उत्खननों से लोथल की जो नगर-योजना और अन्य भौतिक वस्तुएँ प्रकाश में आयी हैं, उनसे लोथल एक लघु हड़प्पा या मोहनजोदड़ो नगर प्रतीत होता है।

  अग्निवेदिका का साक्ष्य लोथल से मिलता है। यहाँ चावल का साक्ष्य मिलता है। फारस की एक मुहर प्राप्त हुई है। यहीं घोड़े की लघु मृणमूर्ति प्राप्त हुई है तथा हाथी दांत का एक स्केल प्राप्त हुआ है। तीन युग्मित समाधि (तीनों जुड़े) प्राप्त हुई है। एक मकान से दरवाजा मुख्य सड़क की ओर खुलने का प्रमाण मिलता है। अनाज पीसने की चक्की का साक्ष्य भी मिलता है। लोथल से प्राप्त एक भांड पर ही चालाक लोमड़ी की कथा अंकित है। यहाँ से ममी की आकृति भी प्राप्त हुई है।


कालीबंगा

  इसका अर्थ है काले रंग की चूड़ियाँ घग्गर नदी के तट पर यह राजस्थान के गंगानगर जिले में स्थित है। दुर्गक्षेत्र का आकार वर्गाकार है। इस क्षेत्र के उत्खननकर्ता अमलानन्द घोष (1953) और बी.के. थापर (1960) हैं। पूर्व-हड़प्पा सभ्यता का यहाँ से साक्ष्य भी मिलता है। यहाँ ईंट के चबूतरे पर सात हवन कुड का साक्ष्य मिलता है। कालीबंगा में कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ है। यहाँ जुते हुए खेत का साक्ष्य मिला है। कालीबंगा में अधिक दूरी पर सरसों की फसल बोयी जाती थी तथा कम दूरी पर चना बोया जाता था। यहाँ अलंकृत ईंटों का साक्ष्य मिला है। कालीबंगा में लकड़ी के पाइप का प्रमाण मिला है। कालीबंगा में दोनों खंड दुगों से घिरे थे। यहाँ से प्राप्त बेलनाकार मुहरें मेसोपोटामिया से प्राप्त मुहरों के समरूप थीं।


बनवाली

  यह हरियाणा के हिसार जिले में स्थित है। इसकी खोज 1973 . में आर.एस. बिष्ट द्वारा की गई। यहाँ से दो सांस्कृतिक अवस्थाएँ प्राप्त हुई हैं। हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन। यहाँ अच्छे किस्म का जौ प्राप्त हुआ है। बनवाली से ताँबे का वाणाग्र प्राप्त हुआ है। यहाँ से हल की आकृति का खिलौना प्राप्त हुआ है। यहाँ नाली पद्धति का अभाव है। यहाँ से ताँबे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है। बनवाली की नगर-योजना शतरंज के बिसात या जाल के आकार की बनायी गयी थी। सड़कें तो सीधी मिलती हैं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। यहाँ से पत्थर एवं मिट्टी के मकानों के साक्ष्य मिलते हैं। यहाँ से सड़कों पर बैलगाड़ियों के पहियों के निशान मिले हैं।