Ancient History । Chapter-13 P-3


अर्थव्यवस्था- सिन्धु घाटी सभ्यता

Economy- Indus Valley Civilization। Part-3



बाह्य व्यापार से संबंधित देश- 

  मेसोपोटामिया, ईरान, अफगानिस्तान, बहरीन, ओमान, सीरिया आदि। आयात, अलबस्टर (अर्द्ध कीमती पत्थर)-बलूचिस्तान, राजस्थान, डामर। बिटुमिन-बलूचिस्तान और मेसोपोटामिया। चांदी-अफगानिस्तान और ईरान, मेसोपोटामिया। सोना-अफगानिस्तान और ईरान। पेस्को महोदय (इतिहासकार) का मानना है कि सोना दक्षिण भारत के कोलार से भी मंगाया जाता था। टिन-अफगानिस्तान और ईरान। सीसा-ईरान और अफगानिस्तान। तांबा-राजस्थान (खेत्री) और लाजवर्त। मणि-बदक्शां और शंख और घोंघे-पं. भारत के तट पर फारस की खाड़ी से। फिरोजा-ईरान।


निर्यात- 

  लोथल में बनी सीप की वस्तुएं, हाथी दांत की वस्तुएं, तैयार माल, कपास, अनाजों का निर्यात भी संभवत: किया जाता था। सिंधु घाटी के पक्ष में व्यापार संतुलन था। हड़प्पा में मेसोपोटामिया की वस्तुओं का पाया जाना, इस तथ्य से स्पष्ट किया जा सकता है कि परंपरागत रूप में मेसोपोटामिया के लोग कपड़े, ऊन, खुशबूदार तेल और चमड़े के उत्पाद बाहर भेजते थे। चूंकि ये चीजें जल्दी नष्ट हो जाती थीं, इसलिए ये हड़प्पा सभ्यता में प्राप्त नहीं होती थीं। विशेषत: अमीर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाह्य व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया था। मुख्य रूप में विलासिता संबंधी सामग्रियों का व्यापार होता था।


महत्त्वपूर्ण बंदरगाह- 

  लोथल, रंगपुर, प्रभासपाटन (सोमनाथ) बालाकोट, सुत्कोगेंडोर एवं सुत्काकोह प्रमुख बंदरगाह नगर थे। बलूचिस्तान आर्थिक रूप से एक सम्पन्न क्षेत्र नहीं था। फिर भी यहाँ के बंदरगाहों की बड़ी अहमियत थी क्योंकि सिंधु एवं गुजरात क्षेत्र के बंदरगाहों के विपरीत ये समुद्री लहरों से ज्यादा सुरक्षित थे। इसलिए बरसात के दिनों में बलूचिस्तान के बंदरगाहों से ही जहाज खुलते थे। लोथल एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) था


परिवहन- 

  मोहनजोदड़ो से पाई गई एक मुहर में नाव को चित्रित किया गया है। पक्की मिट्टी से बनी हुई नाव का नमूना लोथल में पाया गया है जिसमें मस्तूल लगाने का छेद बना हुआ है। अंतर्देशीय परिवहन का साधन बैलगाड़ी था। हड़प्पा एवं चाँहुदड़ो से कांसे की गाड़ी के नमूने मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता में बैलगाड़ी में प्रयुक्त पहिए ठोस होते थे।


माप-तौल

  उत्खनन में प्राप्त कुछ अवशेषों से ऐसा लगता है कि सिन्धु सभ्यता के लोग माप-तौल की प्रक्रिया से भी सुपरिचित थे। ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण सिन्धु (होल) में माप-तौल की समान व्यवस्था प्रचलित थी।

  सीप का बना मानक बाट मोहनजोदड़ो में मिला है। हाथी दांत का एक स्केल लोथल से प्राप्त हुआ है। फीट (फुट) लगभग 33.5 से.मी. का और क्यूविट 52.05 से.मी. का होता था। उपरी स्तर पर दशमलव प्रणाली, जबकि निचले स्तर पर द्विभाजन प्रणाली थी। गणना में 16 एवं उसके गुणक का प्रयोग होता था। पिगट ने उल्लेख किया है कि ये तौल 1, 2, 3, 4, 8, 16, 32, 64, 160, 200, 320 तथा 640 के अनुपात में आगे बढ़ते हैं तथा इस प्रक्रिया में 16 तौल की इकाई रहा होगा जो कि 13.64 ग्राम के बराबर है। सीप का एक खण्डित मापदण्ड मोहनजोदडो से भी मिला है। मैके के अनुसार, 16.55 से.मी. लम्बा, 1.55 से.मी. चौड़ा एवं 675 से.मी. मोटा है तथा एक ओर बराबर दूरी पर नौ का निशान अंकित हैं और दो संकेंत के मध्य की दूरी 0.66 से.मी. है।

  विद्वानों की मान्यता है कि इस प्रकार के मापदण्ड मिश्र, एशिया माइनर, यूनान, सीरिया आदि प्राचीन सभ्यताओं में भी प्रचलित थे। हड़प्पा से तांबे का मापदण्ड मिला है। माधोस्वरूप वत्स ने निवेदन किया है कि 3.75 से.मी. लम्बे मापदण्ड पर 0.93 से.मी. की विभाजक रेखायें अंकित है जो सम्भवत: 51.55 से.मी. के हस्त परिमापन पर आधारित प्रतीत होती है। लोथल से प्राप्त मापदण्ड, मोहनजोदड़ो से प्राप्त मापदण्ड की तुलना में छोटा होते हुए भी अधिक सही लगता है। यह मापदण्ड 128 मिलीमीटर लम्बा है, कुछ भाग टूट गया है, इस पर 27 विभाजक रेखायें 46 मिलीमीटर की दूरी से अंकित हैं एवं दो इकाइयों के मध्य 1.7 मिलिमीटर की दूरी है।